Monday, February 16, 2026
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SC news: कर्नाटक सरकार ने कहा…राष्ट्रपति और राज्यपाल केवल ‘औपचारिक प्रमुख’

SC news: कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि संविधान की व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति और राज्यपाल केवल “औपचारिक प्रमुख” (titular heads) हैं।

पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने हुई बहस

कर्नाटक सरकार ने कहा कि उन्हें केंद्र व राज्यों में मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करना होता है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को आपराधिक कार्यवाही से प्रतिरक्षा देता है, क्योंकि वे कोई कार्यकारी (executive) कार्य नहीं करते। उन्होंने शीर्ष अदालत के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर “राज्यपाल की संतुष्टि” का अर्थ वास्तव में मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है।

अदालत में दलीलें

सुब्रमण्यम ने कहा कि संविधान किसी भी राज्य में निर्वाचित सरकार के समानांतर कोई और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान नहीं करता। मुख्य न्यायाधीश गवई ने पूछा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत लोक सेवकों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने के मामले में क्या राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलना पड़ता है? इस पर वरिष्ठ वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले बताते हैं कि इस विशेष मामले में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से स्वतंत्र होकर अपना विवेक इस्तेमाल कर सकते हैं।

पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष

इससे पहले 3 सितंबर को पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि जनता की इच्छा के प्रतीक विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल और राष्ट्रपति की “मनमानी” पर नहीं छोड़ा जा सकता। टीएमसी सरकार ने कहा था कि राज्यपाल विधानसभा की विधायी क्षमता पर सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

राष्ट्रपति के सवाल और अदालत की जांच

अदालत वर्तमान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए 14 संवैधानिक प्रश्नों की जांच कर रही है। इनमें यह भी शामिल है कि क्या संवैधानिक प्राधिकारी (राष्ट्रपति और राज्यपाल) अनिश्चितकाल तक विधेयकों पर सहमति रोक सकते हैं और क्या अदालतें उन पर समयसीमा लागू कर सकती हैं। इस साल मई में राष्ट्रपति मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी थी कि क्या अदालतें राष्ट्रपति के विवेकाधिकार के प्रयोग पर समयसीमा थोप सकती हैं।

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