Monday, August 17, 2026
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COMPENSATION Case: 23 साल की कानूनी लड़ाई के बाद विधवा को मिला हक… सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता को ढूंढ निकाला, पढ़ें पूरी खबर

COMPENSATION Case: एक विधवा के लिए जो 2002 में ट्रेन हादसे में अपने पति को खो चुकी थी, सुप्रीम कोर्ट ने मानवीयता की मिसाल पेश की।

दानापुर इंटरसिटी से गिरकर पति की हुई थी मौत

शीर्ष अदालत ने खुद यह सुनिश्चित किया कि उसे रेलवे से उसका हक का मुआवजा मिले, वो भी 23 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद। यह मामला सयनोक्ता देवी का है। जिनके पति विजय सिंह ने 21 मार्च 2002 को भागलपुर-दानापुर इंटरसिटी एक्सप्रेस से बख्तियारपुर से पटना जाने के लिए वैध टिकट लिया था। लेकिन ट्रेन में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से वह चलते ट्रेन से गिर गए और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। देवी ने रेलवे से मुआवज़े का दावा किया, लेकिन रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में पटना हाईकोर्ट ने यह कहते हुए दावा ठुकरा दिया कि मृतक “मानसिक रूप से अस्वस्थ” थे। निराश होकर सयनोक्ता देवी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के आदेशों को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के आदेशों को “पूरी तरह बेतुका” और “तथ्यों के विपरीत” बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, “अगर व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ होता, तो वह टिकट खरीदकर खुद ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कैसे कर सकता था?” कोर्ट ने रेलवे को आदेश दिया था कि दो महीने के भीतर देवी को ₹4 लाख मुआवज़ा और 6% वार्षिक ब्याज दिया जाए। लेकिन किस्मत ने फिर धोखा दिया — स्थानीय वकील, जिनके जरिए देवी ने केस लड़ा था, कोर्ट का आदेश बताने से पहले ही चल बसे। उधर, रेलवे ने कई बार पत्र भेजे, लेकिन गलत पते के कारण कोई जवाब नहीं मिला।

अखबारों सहित अन्य माध्यमों से पीड़िता की खोजबीन की

रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि वह आदेश का पालन करने में असमर्थ है क्योंकि महिला का पता नहीं मिल पा रहा है। तब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वी रेलवे को आदेश दिया कि वह अंग्रेज़ी और हिंदी के दो बड़े अख़बारों में सार्वजनिक नोटिस जारी करे, जिसमें यह बताया जाए कि मुआवज़ा स्वीकृत है और आवश्यक दस्तावेज़ दिखाकर राशि प्राप्त की जा सकती है। साथ ही, कोर्ट ने नालंदा के एसएसपी और बख्तियारपुर थाने के एसएचओ को निर्देश दिया कि वे महिला की तलाश करें और उन्हें कोर्ट के आदेश की जानकारी दें। बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी सक्रिय किया गया। ज़िला सचिव को कहा गया कि वे स्वयं महिला के गांव जाएं और उसकी स्थिति की रिपोर्ट कोर्ट को दें।

पीड़िता के गांव का नाम रिकॉर्ड में गलत लिखा था

कई कोशिशों के बाद, रेलवे और स्थानीय पुलिस ने पता लगाया कि देवी के गांव का नाम रिकॉर्ड में ग़लत लिखा गया था, जिसकी वजह से सभी पत्र लौट गए थे। अब पुलिस ने सही गांव और सयनोक्ता देवी को ढूंढ निकाला है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने रेलवे को आदेश दिया कि स्थानीय पुलिस की मौजूदगी में मुआवज़े की पूरी राशि महिला के बैंक खाते में जमा कराई जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत के सरपंच और सदस्य महिला की पहचान की पुष्टि करेंगे। मामले की अगली सुनवाई अब 24 नवंबर को होगी। 23 साल की जद्दोजहद के बाद, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से एक विधवा को आखिरकार न्याय मिला, न सिर्फ कानूनी रूप से, बल्कि इंसाफ की इंसानियत से भी।

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