Monday, August 17, 2026
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Non-recovery of murder weapon: हत्या में हथियार की बरामदगी जरूरी नहीं…कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम फैसला

Non-recovery of murder weapon: कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा, हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी न होना केस को अविश्वसनीय नहीं बना सकता, अगर ट्रायल के दौरान सबूतों से यह साबित हो जाए कि हत्या हुई है।

तीन आरोपियों की सजा-ए-उम्रकैद को बरकरार

अदालत ने 1999 के एक हत्या मामले में तीन आरोपियों की सजा-ए-उम्रकैद को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति देबांगसु घोष और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बार राशिदी की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने ठोस सबूतों के आधार पर आरोप साबित कर दिए हैं। अदालत ने कहा, “जब गवाहों और सबूतों से यह स्पष्ट है कि पीड़ित की हत्या हुई, तो हथियार की बरामदगी या शस्त्र अधिनियम के तहत आरोप न लगने से केस कमजोर नहीं हो जाता।” अदालत ने यह भी कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद हों, तो अपराध के पीछे की मंशा (मोटिव) उतनी अहम नहीं रहती। इस मामले में कम से कम तीन प्रत्यक्षदर्शी मौजूद थे।

यह था मामला

19 जून 1999 को श्रीदाम घोष अपने भाइयों के साथ गंगा नदी में नाव से सफर कर रहे थे। तभी आरोपी धनु घोष और उसके दो साथी पूर्वी बर्दवान जिले के केतुग्राम घाट से उसी नाव पर सवार हुए। शिकायत के अनुसार, कुछ ही देर बाद धनु घोष ने नजदीक जाकर श्रीदाम के गले में पाइपगन से गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर फरवरी 2022 में कटवा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

अपील में क्या कहा गया

अपीलकर्ताओं के वकील का कहना था कि पाइपगन बरामद नहीं हुई और न ही गोली मिली, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने महज अनुमान के आधार पर सजा दी। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी ने हथियार बरामद करने की कोशिश भी नहीं की। वहीं राज्य पक्ष के वकील ने कहा कि गवाहों के बयान और सबूत इतने ठोस हैं कि किसी शक की गुंजाइश नहीं बचती। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान ने साफ कर दिया कि यही आरोपी हत्या में शामिल थे।

अदालत का निर्णय

खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे जाकर आरोप साबित किए हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बचाव पक्ष की यह दलील कि पुरानी दुश्मनी के कारण फंसाया गया है, उल्टा असर डाल सकती है—क्योंकि यह बात हत्या के पीछे की मंशा को भी दर्शा सकती है। हाईकोर्ट ने कहा, “हम निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप की कोई वजह नहीं देखते। सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाता है।

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