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Tribunals Reforms Act: ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट की अहम धाराएं रद्द, कहा– संसद कोर्ट के फैसलों को ओवरराइड नहीं कर सकती

Tribunals Reforms Act: केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट की अहम धाराएं रद्द कर दी।

137 पन्नों के फैसले में विस्तार से चर्चा

ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण धाराओं को रद्द कर दिया। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “संसद किसी फैसले को मामूली बदलाव कर दोबारा कानून बनाकर नहीं पलट सकती। 137 पन्नों के इस फैसले में चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने केंद्र पर यह कहते हुए नाराजगी जताई कि सरकार ने वही प्रावधान फिर से कानून में शामिल कर दिए, जिन्हें पहले भी कोर्ट कई बार असंवैधानिक ठहरा चुका है।

बेंच ने कहा

“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र बार-बार इस अदालत के स्पष्ट निर्देशों को नहीं मान रहा। संसद ने पहले रद्द हो चुके प्रावधानों को नए नाम और रूप में वापस लाकर उन्हीं संवैधानिक बहसों को दोबारा खोल दिया है जिन्हें यह अदालत पहले निपटा चुकी है।”

50 वर्ष की न्यूनतम आयु, 4 साल का कार्यकाल भी रद्द

मद्रास बार एसोसिएशन और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष की शर्त, चेयरपर्सन और सदस्यों का 4 साल का निश्चित कार्यकाल, सर्च-कम-सेलेक्शन कमेटी द्वारा प्रत्येक पद के लिए दो नामों का पैनल देने की बाध्यता, जैसे विवादित प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट का कहना था कि इस तरह के प्रावधान कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव का रास्ता खोलते हैं।

सीजेआई ने कहा

“स्थिर कार्यकाल और अधिकारों की सुरक्षा, न्यायिक स्वतंत्रता का मूल हिस्सा हैं। इनसे कोर्ट के पहले के निर्देशों से हटना संभव नहीं।”

जस्टिस चंद्रन ने कहा

“ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 तो बस पहले रद्द किए गए ऑर्डिनेंस की नकल है—पुरानी शराब नई बोतल में।”

संसद क्या कर सकती है, क्या नहीं?

बेंच ने साफ कहा, एक बार कोर्ट जिस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दे, संसद उसका समान रूप दोबारा नहीं ला सकती। हाँ, संसद कोर्ट द्वारा बताए गए दोष को दूर कर नया ढांचा बना सकती है, पर पुराने कानून की कॉपी-पेस्ट नहीं।

पेंडेंसी कम करना संयुक्त जिम्मेदारी

कोर्ट ने लंबित मामलों की बड़ी संख्या की ओर इशारा करते हुए कहा कि पेंडेंसी कम करना सिर्फ न्यायपालिका की नहीं, बल्कि सरकार की भी संयुक्त जिम्मेदारी है। “कानून बनाने में संवैधानिक सिद्धांतों और पूर्व फैसलों का सम्मान जरूरी है। इससे संस्थागत समय नई बहसों में बर्बाद नहीं होता और न्यायिक व्यवस्था आगे बढ़ती है।”

चार महीने में ‘नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन’ बनाने का आदेश

बेंच ने केंद्र सरकार को 4 महीने के भीतर नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन स्थापित करने का आदेश दिया। यह कमीशन ट्रिब्यूनलों में नियुक्तियों, प्रशासन और कामकाज की पारदर्शिता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संरचनात्मक ढांचा तैयार करेगा।

पुरानी नियुक्तियां सुरक्षित

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक्ट के लागू होने से पहले जिन लोगों का चयन हो चुका था लेकिन औपचारिक नियुक्ति अधिसूचना बाद में जारी हुई—उनकी नियुक्तियां सुरक्षित रहेंगी।

यह है पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स ऑर्डिनेंस, 2021 की कई धाराओं—खासकर 4 साल के कार्यकाल—को असंवैधानिक ठहराया था। लेकिन इसके बाद भी केंद्र ने अगस्त 2021 में लगभग वही प्रावधान फिर से एक्ट में डाल दिए, जिसके खिलाफ यह नई चुनौती दायर हुई थी।

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