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SC slams: सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया दिग्गज Meta व WhatsApp से कहा, या तो आप खुद सुधार करें, या फिर हम आदेश पारित करेंगे।
9 फरवरी को अंतरिम आदेश (Interim Order) पारित किया जाएगा
शीर्ष कोर्ट ने सोशल मीडिया दिग्गज Meta व WhatsApp के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने डेटा शेयरिंग और प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर टेक कंपनियों को चेतावनी देते हुए कहा कि नागरिकों की निजता के अधिकार (Right to Privacy) के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने घोषणा की कि इस मामले में 9 फरवरी को अंतरिम आदेश (Interim Order) पारित किया जाएगा।
“डेटा शेयरिंग के नाम पर जानकारी की चोरी”
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने बेहद तीखी टिप्पणियां कीं
- गोपनीयता का अधिकार: CJI ने कहा, “डेटा शेयरिंग के नाम पर आप इस देश की प्राइवेसी के साथ नहीं खेल सकते। हम आपको डेटा का एक शब्द भी शेयर करने की अनुमति नहीं देंगे।”
- ‘सभ्य तरीके से चोरी’: कोर्ट ने प्राइवेसी की शर्तों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन्हें इतना जटिल बनाया गया है कि एक आम आदमी इन्हें समझ ही नहीं सकता। बेंच ने इसे “निजी जानकारी की चोरी करने का एक सभ्य तरीका” करार दिया।
- अंडरटेकिंग की मांग: कोर्ट ने कंपनियों से अंडरटेकिंग (वचनपत्र) देने को कहा है कि वे प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं करेंगी, अन्यथा अदालत सख्त आदेश पारित करेगी।
यह है पूरा मामला?
- यह विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा Meta पर लगाए गए ₹213.14 करोड़ के जुर्माने से जुड़ा है।
- जुर्माना क्यों? CCI ने पाया था कि WhatsApp की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी के जरिए Meta ने अपनी मजबूत स्थिति का दुरुपयोग किया और यूजर्स का डेटा अन्य Meta ऐप्स के साथ शेयर किया।
- NCLAT का रुख: नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने भी CCI के फैसले को बरकरार रखा था, जिसके खिलाफ कंपनियां सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं।
- IT मंत्रालय पक्षकार: सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।
यह है महत्वपूर्ण बिंदु
- बड़ी चेतावनी: कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भारत में निजता के अधिकार की सुरक्षा पूरी मुस्तैदी से की जाएगी।
- अदालत का संदेश: “या तो आप खुद सुधार करें, नहीं तो हमें आदेश पारित करना होगा।”
जिस विशेष शर्त पर सबसे ज़्यादा विवाद है, वह है ‘क्रॉस-प्लेटफ़ॉर्म डेटा शेयरिंग’ (Cross-Platform Data Sharing)
2021 की प्राइवेसी पॉलिसी के ज़रिए WhatsApp ने अपने यूज़र्स के लिए ‘Take it or Leave it’ (मानो या ऐप छोड़ दो) की स्थिति पैदा कर दी थी।
मुख्य विवादास्पद शर्तें इस प्रकार हैं
- Meta के साथ अनिवार्य डेटा शेयरिंग: इस पॉलिसी के तहत WhatsApp यूज़र्स का डेटा (जैसे फ़ोन नंबर, ट्रांज़ैक्शन डेटा, आईपी एड्रेस और ऐप के साथ इंटरैक्शन) अनिवार्य रूप से Meta की अन्य कंपनियों (Facebook और Instagram) के साथ शेयर किया जाना था।
- विज्ञापन और मार्केटिंग: CCI का आरोप है कि Meta इस डेटा का इस्तेमाल यूज़र्स की प्रोफाइलिंग करने और उन्हें Facebook/Instagram पर टारगेटेड विज्ञापन दिखाने के लिए करना चाहता है।
- कोई ‘Opt-out’ विकल्प नहीं: पहले यूज़र्स के पास यह चुनने का विकल्प था कि उनका डेटा Facebook के साथ शेयर हो या नहीं, लेकिन नए अपडेट में इस विकल्प को खत्म कर दिया गया।
CCI और सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति क्यों है?
- प्रतिस्पर्धा विरोधी (Anti-Competitive): CCI का मानना है कि Meta अपनी एक ऐप (WhatsApp) के प्रभुत्व का इस्तेमाल दूसरी ऐप (Facebook/Instagram) के विज्ञापन बिज़नेस को बढ़ाने के लिए कर रहा है, जो बाज़ार के नियमों के खिलाफ है।
- निजता का हनन: सुप्रीम कोर्ट की चिंता यह है कि यूज़र्स को अंधेरे में रखकर उनके व्यवहार और व्यक्तिगत आदतों का डेटा व्यावसायिक लाभ के लिए बेचा या इस्तेमाल किया जा रहा है।
9 फरवरी के आदेश में क्या हो सकता है?
- डेटा शेयरिंग पर स्टे: कोर्ट Meta को भारतीय यूज़र्स का डेटा किसी भी अन्य ऐप के साथ शेयर करने से अस्थायी रूप से रोक सकता है।
- ‘Opt-out’ विकल्प की बहाली: कोर्ट आदेश दे सकता है कि यूज़र्स को यह विकल्प दिया जाए कि वे बिना ऐप छोड़े डेटा शेयरिंग को मना कर सकें।
- आईटी मंत्रालय की भूमिका: मंत्रालय से पूछा जा सकता है कि नया ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट’ (DPDP Act) इन विदेशी टेक कंपनियों पर कितनी कड़ाई से लागू हो रहा है।
भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) के पूरी तरह लागू होने के बाद, WhatsApp और Meta जैसी कंपनियों के लिए मनमानी करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
नए कानून के तहत ये 4 बड़े बदलाव आएंगे
- सहमति’ का मतलब बदलेगा (Clear Consent)
अभी प्राइवेसी पॉलिसी के पन्ने इतने लंबे और जटिल होते हैं कि कोई उन्हें पढ़ता नहीं। नए कानून के तहत WhatsApp को सरल और स्पष्ट भाषा में बताना होगा कि वह कौन सा डेटा ले रहा है और क्यों। यूज़र्स को यह विकल्प देना होगा कि वे अपनी सहमति कभी भी वापस (Withdraw) ले सकें। यदि आप डेटा शेयरिंग के लिए मना करते हैं, तो कंपनी आपको ऐप इस्तेमाल करने से नहीं रोक पाएगी (जब तक कि वह डेटा ऐप चलाने के लिए अनिवार्य न हो)।
- ‘डेटा मिनिमाइजेशन’ का नियम
कंपनियां अब “भविष्य के इस्तेमाल” के नाम पर ज़रूरत से ज़्यादा डेटा इकट्ठा नहीं कर पाएंगी। WhatsApp केवल वही डेटा ले सकेगा जो मैसेजिंग सेवा देने के लिए बेहद ज़रूरी है। Meta के विज्ञापन बिज़नेस के लिए WhatsApp का डेटा इस्तेमाल करना ‘उद्देश्य के उल्लंघन’ की श्रेणी में आ सकता है, जिसके लिए भारी जुर्माना देना होगा।
- भारी जुर्माने का प्रावधान
पुराने कानूनों में जुर्माने की राशि बहुत कम थी, लेकिन DPDP Act के तहत डेटा उल्लंघन या नियमों की अनदेखी पर कंपनियों पर ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन करने पर यह राशि बढ़ भी सकती है, जो टेक दिग्गजों के लिए एक बड़ा वित्तीय जोखिम होगा।
- डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (DPB)
सरकार एक डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड का गठन करेगी। यदि आपको लगता है कि WhatsApp आपकी प्राइवेसी का उल्लंघन कर रहा है, तो आप सीधे इस बोर्ड में शिकायत कर सकेंगे। बोर्ड के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां होंगी और वह कंपनियों को तुरंत डेटा डिलीट करने या पॉलिसी बदलने का आदेश दे सकेगा।






