Front-of-pack labelling: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) से उस सुझाव पर जवाब मांगा है, जिसमें चीनी, नमक और संतृप्त वसा (Saturated Fat) के उच्च स्तर वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर ‘फ्रंट-ऑफ-पैक’ (FoP) लेबलिंग शुरू करने की बात कही गई है।
क्या है फ्रंट-ऑफ-पैक (FoP) लेबलिंग?
यह पोषण-लेबलिंग की एक सरल और साक्ष्य-आधारित प्रणाली है, जिसे खाद्य पैकेटों के सामने के हिस्से पर लगाया जाता है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को त्वरित और बेहतर स्वास्थ्य निर्णय लेने में मदद करना है, ताकि वे जान सकें कि उत्पाद में हानिकारक तत्वों की मात्रा कितनी है।
मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट ‘3S’ और ‘अवर हेल्थ सोसाइटी’ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में केंद्र और राज्यों को पैकेज्ड फूड पर अनिवार्य चेतावनी लेबल (FoPL) लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
FSSAI का पक्ष और कोर्ट की नाराजगी
- FSSAI ने अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि वह अभी इस पर और शोध करना चाहता है। वह ठोस और तरल श्रेणियों के विभिन्न पैकेज्ड उत्पादों का व्यवस्थित मैपिंग (Mapping) करने और उपभोक्ताओं के बीच सर्वेक्षण करने का इरादा रखता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस हलफनामे पर असंतोष व्यक्त किया।
- निराशाजनक प्रगति: पीठ ने कहा कि अब तक की गई कवायद का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है।
- स्वास्थ्य का अधिकार: कोर्ट ने 10 फरवरी के अपने आदेश में कहा, “यह PIL एक विशेष उद्देश्य से दायर की गई थी। इसने देश के नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है।”
अदालत का आदेश
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के उस सुझाव पर ध्यान दिया जिसमें कहा गया है कि किसी भी प्री-पैकेज्ड खाद्य उत्पाद के रैपर या पैकेट पर चेतावनी (Warning) होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को इस सुझाव पर चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

