LAW RESEARCHERS’ Fee: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को बड़ा झटका दिया है।
लॉ रिसर्चर्स (Law Researchers) को पिछली तारीख से बढ़ी हुई सैलरी (Retrospective Remuneration) देने के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस याचिका को सुप्रीम अदालत ने खारिज कर दिया।
“युवाओं का नुकसान क्यों?”
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। सुनवाई के दौरान बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा, “सरकार की देरी की वजह से युवाओं को नुकसान क्यों उठाना चाहिए?”
क्या था पूरा मामला?
- हाईकोर्ट का फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने लॉ रिसर्चर्स की मासिक सैलरी ₹65,000 से बढ़ाकर ₹80,000 कर दी थी। यह बढ़ोतरी अक्टूबर 2022 से लागू (Retrospective) की गई थी।
- सरकार की दलील: दिल्ली सरकार ने दलील दी कि पिछली तारीख से भुगतान करने पर सरकारी खजाने पर ₹9.45 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा, जो बजट में शामिल नहीं था।
- संवैधानिक तर्क: सरकार का यह भी कहना था कि सैलरी और भत्तों से जुड़े ऐसे फैसलों के लिए संविधान के अनुच्छेद 229(2) के तहत उपराज्यपाल (LG) की मंजूरी अनिवार्य है।
कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को दरकिनार कर दिया। कोर्ट का मानना था कि जो युवा न्यायपालिका के कामकाज में सहयोग कर रहे हैं, उन्हें उनके वाजिब हक से सिर्फ प्रशासनिक या बजटीय कारणों से वंचित नहीं किया जा सकता।

