Refer a case: दिल्ली की एक सत्र अदालत ने सात वर्षीय मासूम बच्चे के साथ यौन शोषण के आरोपी स्कूल वैन ड्राइवर की सजा को रद्द कर दिया है।
अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने सजा सुनाते समय कानून द्वारा निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) अभिषेक गोयल ने आरोपी की अपील को स्वीकार करते हुए 10 मार्च के अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत द्वारा दी गई 5 साल की जेल और जुर्माना कानूनन टिकाऊ नहीं हैं।
क्या थी कानूनी चूक? (CrPC की धारा 325 का मामला)
- यह पूरा मामला कानूनी प्रक्रिया के गलत पालन पर आधारित है।
- मजिस्ट्रेट की गलती: न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) ने 12 अगस्त 2025 को आरोपी को दोषी करार दिया और सजा के लिए मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) को भेज दिया।
नियम क्या है? CrPC की धारा 325 के तहत, यदि कोई मजिस्ट्रेट यह मानता है कि आरोपी दोषी है लेकिन वह उसे पर्याप्त कठोर सजा देने के लिए अधिकृत नहीं है, तो उसे केवल अपनी ‘राय’ (Opinion) दर्ज करनी चाहिए, न कि ‘दोषसिद्धि का फैसला’ (Judgment of Conviction) सुनाना चाहिए। - CJM की चूक: सत्र न्यायालय ने पाया कि CJM ने भी गलती की। उन्हें मजिस्ट्रेट के फैसले को केवल एक राय मानकर खुद स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच करनी चाहिए थी और अपना नया फैसला सुनाना चाहिए था। इसके बजाय, उन्होंने सीधे सजा सुना दी।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां
“मजिस्ट्रेट ने आरोपी को दोषी करार देने में गलती की, जबकि उन्हें कानून के अनुसार केवल अपनी राय देनी चाहिए थी। वहीं, CJM ने भी बिना स्वतंत्र जांच के सीधे सजा सुनाकर प्रक्रिया का उल्लंघन किया।”
मामले की पृष्ठभूमि
- आरोप: दिसंबर 2011 में एक पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी कि वैन ड्राइवर ने स्कूल ले जाते समय उनके 7 साल के बेटे के साथ कई हफ्तों तक यौन शोषण किया।
- सजा: दिसंबर 2025 में CJM हर्षिता मिश्रा ने आरोपी को 5 साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अब आगे क्या होगा?
सत्र अदालत ने मामले को वापस CJM के पास भेज दिया है। अब CJM को इस मामले की मेरिट के आधार पर नए सिरे से सुनवाई करनी होगी। वे चाहें तो गवाहों को दोबारा बुला सकते हैं या नए सबूत ले सकते हैं। आरोपी को 25 मार्च को CJM के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है।

