State under Constitution: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि वायु सेना समूह बीमा सोसायटी (AFGIS) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत एक ‘राज्य’ (State) है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के 1 फरवरी 2023 के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें AFGIS को निजी संस्था मानकर कर्मचारियों के वेतन विवाद की याचिका को सुनने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने माना कि यह संस्था सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवारों के कल्याण की रक्षा करके ‘सार्वजनिक कर्तव्य’ (Public Duty) निभाती है।
क्यों माना गया इसे ‘राज्य’?
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने 12 मार्च के फैसले में AFGIS पर सरकारी नियंत्रण के कई प्रमाण दिए।
- गहरा और व्यापक नियंत्रण: भारत के राष्ट्रपति ने AFGIS की स्थापना की मंजूरी दी और इसके प्रतिनियुक्ति नियमों (Deputation Rules) को विशेष रूप से अनुमोदित किया।
- अनिवार्य सदस्यता: वायु सेना में सेवा देने वाले प्रत्येक अधिकारी के लिए इसकी सदस्यता और वेतन से कटौती अनिवार्य है। यह कर्मचारी की पसंद नहीं, बल्कि नियोक्ता (सरकार) का आदेश है।
- प्रशासनिक ढांचा: सोसायटी के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज और प्रबंध समिति के सभी सदस्य भारतीय वायु सेना के सेवारत अधिकारी हैं।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां
“सशस्त्र बलों के कर्मियों का कल्याण और सुरक्षा सरकार का मूल कार्य है। बीमा कवरेज सेवा सदस्यों के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है।”
सुविधा बनाम जिम्मेदारी
पीठ ने हैरानी जताई कि AFGIS ने सर्विस टैक्स से छूट मांगते समय खुद को ‘सरकार’ बताया था, लेकिन कर्मचारियों के वेतन मामले में वह इससे मुकर रही है। जस्टिस करोल ने कहा, “हम यह समझने में विफल हैं कि कोई संगठन एक उद्देश्य के लिए सरकार हो सकता है और दूसरे के लिए नहीं।”
सशस्त्र बलों के प्रति राज्य का दायित्व
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा सीधे सशस्त्र बलों से जुड़ी है। उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, ऐसे में स्वास्थ्य सेवा और आश्रितों को सहायता मिलने का भरोसा उन्हें निश्चिंत होकर ड्यूटी करने में मदद करता है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि उनके संरक्षण की जिम्मेदारी रिटायरमेंट के साथ खत्म नहीं होती।
इसका क्या प्रभाव होगा?
- वेतन विसंगति: AFGIS के कर्मचारी अब छठे वेतन आयोग के लाभों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ सकेंगे।
- रिट याचिका: चूंकि अब यह ‘राज्य’ है, इसलिए इसके खिलाफ मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
- हाई कोर्ट को निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह 2017 से लंबित इस मामले का शीघ्र निपटारा करे।

