Deceased persons’ account: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से पूछा है कि मृतकों के बैंक खातों और जमा राशि का विवरण उनके कानूनी वारिसों को देने में क्या बाधा है?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दिग्गज पत्रकार सुचेता दलाल द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने जोर देकर कहा कि सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर एक स्पष्ट और ठोस नीति बनानी चाहिए।
अदालत की तल्ख टिप्पणी: “वारिसों को कैसे पता चलेगा?”
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक व्यवहारिक स्थिति सामने रखी। कहा, मान लीजिए किसी व्यक्ति के अलग-अलग देशों या शहरों में 10 खाते हैं और उसकी वसीयत बनाए बिना मृत्यु हो जाती है, तो उसके वारिसों को विवरण कैसे मिलेगा? हो सकता है उसने KYC न कराया हो… हम यह नहीं कह रहे कि ट्रांसफर अवैध है, हम बस यह पूछ रहे हैं कि वारिसों को जानकारी देने में गलत क्या है?
करोड़ों रुपये ‘लावारिस’ पड़े हैं
- याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कुछ चौंकाने वाले आंकड़े और दलीलें पेश कीं।
- बढ़ता फंड: ‘डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड’ (DEAF) में मार्च 2021 के अंत तक 39,264.25 करोड़ रुपये जमा थे, जो 2019 में केवल 18,381 करोड़ रुपये थे।
- केंद्रीय डेटाबेस की मांग: याचिका में मांग की गई है कि RBI के नियंत्रण में एक ‘सेंट्रलाइज्ड और सर्चेबल ऑनलाइन डेटाबेस’ बनाया जाए, जहाँ वारिस नाम और पते के जरिए अपने मृत परिजनों के खातों को खोज सकें।
सरकार और RBI का पक्ष
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमण ने कहा कि यदि कोई वास्तविक वारिस सामने आता है, तो DEAF फंड से उसे राशि वापस कर दी जाती है। हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया को और सरल और पारदर्शी बनाने पर जोर दिया ताकि आम आदमी को मुकदमेबाजी से न गुजरना पड़े।
याचिका की मुख्य मांगें
- सार्वजनिक विवरण: लावारिस खातों का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
- सर्च सुविधा: एक ऐसी प्रणाली हो जिससे लोग आसानी से बैंक खाते, बीमा, पोस्ट ऑफिस फंड और अन्य जमा राशि का पता लगा सकें।
- प्रक्रिया का सरलीकरण: कानूनी वारिसों के दावों को निपटाने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया बने जिसमें अनावश्यक मुकदमों की जरूरत न पड़े।

