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Wife’s Murder: Dying Declaration की कानूनी अहमियत या Section 302…बेटी अपने पिता के खिलाफ झूठ क्यों बोलेगी?

Wife’s Murder: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पत्नी को केरोसिन डालकर जिंदा जलाने के दोषी व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले पर मुहर लगा दी है, जिसमें आरोपी को IPC की धारा 302 (हत्या) और 498A (क्रूरता) के तहत दोषी ठहराया गया था।सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को ‘Devoid of merit’ (आधारहीन) बताते हुए खारिज कर दिया। जो आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर था, उसे तुरंत सरेंडर करने और अपनी बाकी की उम्रकैद की सजा काटने का आदेश दिया गया है। अदालत ने आरोपी की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि 80-90% जलने के बाद पीड़िता बयान देने की स्थिति में नहीं थी।

केस की पूरी कहानी (The Background)

  • विवाद की जड़: पति-पत्नी की शादी को 17 साल हो चुके थे और उनके 4 बच्चे थे। शुरुआती सालों के बाद पति अक्सर पैसों के लिए पत्नी को प्रताड़ित करने लगा था।
  • वारदात: 20 जुलाई 2000 की रात, पैसों को लेकर फिर झगड़ा हुआ। गुस्से में आकर पति ने पत्नी पर मिट्टी का तेल (Kerosene) डाला और आग लगा दी।
    -मौत: पड़ोसियों ने आग बुझाई और उसे बेंगलुरु के विक्टोरिया अस्पताल ले गए, जहाँ 4 दिन बाद उसकी मौत हो गई।

कोर्ट के फैसले के 3 मुख्य आधार

  • Dying Declaration (मृत्यु पूर्व कथन) की वैधता: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने कहा कि डॉक्टरों ने साफ तौर पर प्रमाणित (Endorse) किया था कि पीड़िता बयान देते समय पूरी तरह होश में और मानसिक रूप से फिट थी। पुलिस से पहले डॉक्टरों की गवाही को प्राथमिकता दी गई।
  • बेटी की चश्मदीद गवाही: इस केस में सबसे अहम गवाह उनकी अपनी बेटी थी। कोर्ट ने कहा, “बेटी ने पूरी घटना अपनी आंखों से देखी और बयान में कोई विसंगति नहीं थी। ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि एक बेटी अपने ही पिता के खिलाफ झूठी गवाही क्यों देगी।”
  • ट्रायल कोर्ट की गलती सुधारी: शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था। लेकिन हाई कोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गवाहों के बयानों में छोटी-मोटी विसंगतियों (Slight Discrepancies) के आधार पर इतने गंभीर अपराध में किसी को बरी नहीं किया जा सकता।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL No. 2432 OF 2010
PANKAJ MITHAL J., S.V.N. Bhatti J.
SUBRAMANI VERSUS STATE OF KARNATAKA

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