Religious functions: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए दोहराया है कि किसी भी व्यक्ति के निजी परिसर के भीतर होने वाली प्रार्थनाओं और धार्मिक कार्यों पर कोई कानूनी बाधा या प्रतिबंध (Embargo) नहीं लगाया जा सकता, चाहे वह किसी भी धर्म या आस्था का अनुयायी क्यों न हो।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अपने धर्म का पालन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसके लिए किसी औपचारिक अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
सम्भल मामले में प्रशासन को कड़ी फटकार
- यह आदेश सम्भल के एक निवासी मुनज़िर खान की याचिका पर आया है, जिन्होंने आरोप लगाया था कि प्रशासन रमज़ान के दौरान उनके परिसर में केवल 20 लोगों को नमाज़ पढ़ने की अनुमति दे रहा है।
- कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने सम्भल के कलेक्टर और एसपी को कड़ी चेतावनी देते हुए पहले कहा था कि यदि वे कानून के शासन (Rule of Law) को लागू करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या तबादला ले लेना चाहिए।
- यथास्थिति: हालांकि कोर्ट ने पाया कि वर्तमान में वह संरचना तकनीकी रूप से ‘मस्जिद’ के रूप में दर्ज नहीं है, लेकिन चूंकि वहां पहले से नमाज़ पढ़ी जाती रही है, इसलिए श्रद्धालुओं को वहां प्रार्थना करने से नहीं रोका जाएगा।
विविधता में एकता पर कोर्ट के विचार
पीठ ने भारत की सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक मूल्यों पर मर्मस्पर्शी टिप्पणी की। 1.4 अरब की मानवता वाले इस गणराज्य की महिमा इसकी ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता में निहित है। यहाँ हर प्रमुख धर्म सदियों से शांति और आपसी सम्मान के साथ सह-अस्तित्व में रहा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा औपचारिक रूप दिया गया है।
ईसाई प्रार्थना सभाओं पर भी लागू होगा नियम
- पिछले महीने, कोर्ट ने ‘मरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज’ और ‘इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट’ की याचिकाओं पर भी ऐसा ही आदेश दिया था।
- नियम: निजी परिसर में प्रार्थना सभा के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने भी स्वीकार किया कि कानून में ऐसी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
- शर्त: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि धार्मिक सभा सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक संपत्ति तक फैलती है, तो पुलिस को सूचित करना और कानून के तहत आवश्यक अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
फैसले के मुख्य बिंदु
- मौलिक अधिकार: निजी स्थान पर पूजा करना अनुच्छेद 25 के तहत सुरक्षित है।
- प्रशासनिक सीमा: ‘कानून और व्यवस्था’ का हवाला देकर मौलिक अधिकारों को मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता।
- सार्वजनिक व्यवस्था: केवल तभी हस्तक्षेप संभव है जब निजी आयोजन से सार्वजनिक शांति या यातायात प्रभावित हो।

