Friday, September 18, 2026
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Hate Speech: ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाने वाले जरूर पढ़ें… SC ने यह कह दी बड़ी बात

Hate Speech: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, Brahmophobia और Hate Speech को लेकर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कई सुझाव दिए।

दरअसल, सुप्रीम अदालत उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषणों (Hate Speech) को ‘ब्रह्मोफोबिया’ (Brahmophobia) बताकर इसे दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि कोई विशिष्ट घटना होती है, तो उसके लिए उचित फोरम (जैसे पुलिस या निचली अदालत) में जाना चाहिए, न कि सीधे सुप्रीम कोर्ट।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां: सिर्फ एक समुदाय क्यों?

  • जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने याचिकाकर्ता महालिंगम बालाजी से कड़े सवाल पूछे।
  • समानता का सिद्धांत: जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि कोई एक विशेष समुदाय सिर्फ अपने लिए सुरक्षा क्यों मांग रहा है? उन्होंने कहा, “हम देश में किसी भी समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच नहीं चाहते। यह शिक्षा, बौद्धिक विकास, सहनशीलता और धैर्य पर निर्भर करता है।”
  • भाईचारे का महत्व: कोर्ट ने कहा कि यदि हर कोई ‘Fraternity’ (भाईचारे) के सिद्धांत का पालन करे, तो हेट स्पीच अपने आप खत्म हो जाएगी।
  • न्यायपालिका पर हमला: जब याचिकाकर्ता ने कहा कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका को भी निशाना बनाया जा रहा है, तो बेंच ने स्पष्ट किया कि वह न्यायपालिका पर होने वाले झूठे हमलों से चिंतित नहीं है।

याचिकाकर्ता की क्या थीं मांगें?

  • बालाजी ने अपनी याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को कई निर्देश देने की मांग की थी।
  • ब्रह्मोफोबिया को पहचानें: ब्राह्मणों के खिलाफ हेट स्पीच को जाति-आधारित भेदभाव मानकर दंडनीय अपराध बनाया जाए।
  • साजिश की जांच: ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले घरेलू या विदेशी ‘कोऑर्डिनेटेड कैंपेन’ की जांच एजेंसियां जांच करें।
  • सत्य एवं न्याय आयोग (Truth Commission): 1948 के महाराष्ट्र ब्राह्मण नरसंहार और 1990 के कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की जांच के लिए एक हाई-लेवल कमीशन बनाया जाए और पीड़ितों को पुनर्वास व सहायता दी जाए।
  • अयोग्यता: ब्राह्मणों के खिलाफ हेट स्पीच देने वाले किसी भी सरकारी या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को अयोग्य घोषित किया जाए।

नतीजा: याचिका वापस ली गई

बेंच के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए याचिका को ‘Dismissed as Withdrawn’ (वापस लेने के आधार पर खारिज) कर दिया।

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