Wednesday, July 22, 2026
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UP Anti-Conversion Law: फर्जी FIR एक खतरनाक ट्रेंड…सरकार से पूछा- ऐसे मामलों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए?

UP Anti-Conversion Law: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 (Anti-Conversion Law) के तहत दर्ज हो रहे “फर्जी मुकदमों” को लेकर बहुत ही सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने बहराइच जिले के तीन मुस्लिम पुरुषों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कोर्ट ने इसे एक “चिंताजनक प्रवृत्ति” (Disturbing Trend) करार दिया है, जहाँ तीसरे पक्ष (Third Parties) या रिश्तेदारों द्वारा केवल प्रेम संबंधों में बाधा डालने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है।

मामला क्या था? (The Discrepancy in Allegations)

  • शिकायत: एक पिता ने FIR दर्ज कराई कि उसकी बेटी को एक मुस्लिम युवक ने बहला-फुसलाकर अगवा कर लिया है और वह उसका धर्म परिवर्तन कराकर निकाह करने की कोशिश कर रहा है।
  • सच्चाई (Victim’s Statement): युवती ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया कि वह बालिग है और पिछले तीन साल से उस युवक से प्यार करती है। उसने स्पष्ट किया कि न तो उसका धर्म परिवर्तन हुआ है, न ही उस पर किसी ने दबाव डाला है।
  • डर: युवती ने कोर्ट से गुहार लगाई कि उसे अपने रिश्तेदारों और “हिंदू संगठनों” से जान का खतरा है, जो उसे और उसके प्रेमी के परिवार को परेशान कर रहे हैं।

हाई कोर्ट का कड़ा सवाल: जांच अधिकारी पर किसका दबाव?

  • कोर्ट ने जांच की दिशा पर हैरानी जताते हुए इसे “अजीबोगरीब मोड़” (Peculiar Turn) कहा।
  • जांच जारी क्यों?: कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब युवती ने मजिस्ट्रेट के सामने साफ कह दिया कि कोई अपराध नहीं हुआ, तो जांच अधिकारी (I.O.) अभी भी अन्य धाराओं में जांच क्यों कर रहा है?
  • दबाव की आशंका: कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि जांच अधिकारी किसी बाहरी दबाव में या किसी अन्य कारक से ‘प्रेरित’ होकर काम कर रहा है, जो न्यायिक प्रक्रिया का मजाक है।

झूठी FIR के खिलाफ कोर्ट के कड़े निर्देश

  • अदालत ने केवल इस केस को नहीं देखा, बल्कि इस “ट्रेंड” को जड़ से खत्म करने के लिए आदेश दिए।
  • ACS (Home) से व्यक्तिगत हलफनामा: उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा गया है कि उन मामलों में क्या कार्रवाई की जा रही है जहाँ FIR पूरी तरह फर्जी और आधारहीन निकलती हैं।
  • समय की बर्बादी: कोर्ट ने कहा कि ऐसी फर्जी FIR अधिकारियों का कीमती समय बर्बाद करती हैं, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं होता।
  • व्यक्तिगत उपस्थिति: यदि 19 मई (2026) तक हलफनामा नहीं मिलता, तो ACS (Home) को रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होना होगा।
  • शिकायतकर्ता को समन: कोर्ट ने युवती के पिता (शिकायतकर्ता) को भी तलब किया है और पूछा है कि “झूठी और फर्जी FIR” दर्ज कराने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।

सुरक्षा के कड़े आदेश

  • अदालत ने न केवल कानूनी बल्कि मानवीय सुरक्षा पर भी ध्यान दिया।
  • गिरफ्तारी पर रोक: याचिकाकर्ताओं (तीनों मुस्लिम पुरुषों) की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी गई है।
  • राज्य सुरक्षा (State Protection): युवती की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को देखते हुए कोर्ट ने आदेश दिया कि युवती, उसके परिवार और आरोपियों को पर्याप्त सरकारी सुरक्षा प्रदान की जाए।

निष्कर्ष: कानून बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह रुख सुप्रीम कोर्ट के ‘राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025)’ के फैसले के अनुरूप है। यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो ‘एंटी-कन्वर्जन लॉ’ का इस्तेमाल आपसी रंजिश या निजी संबंधों को तोड़ने के लिए हथियार के तौर पर करते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बालिग व्यक्तियों की पसंद और स्वतंत्रता के ऊपर किसी तीसरे पक्ष का “नैतिक पुलिसिंग” बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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