Advocates Blacklist: सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) कॉशन लिस्ट (Caution List) के जरिए वकीलों को ब्लैकलिस्ट कर सकने के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें एक वकील ने IBA की 2020 की कॉशन लिस्ट को चुनौती दी है। इस लिस्ट के कारण कई बैंकों ने उक्त वकील की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। यह मामला न केवल वकीलों के पेशे की स्वतंत्रता से जुड़ा है, बल्कि यह भी तय करेगा कि बैंक किसी पैनल वकील की ‘लापरवाही’ पर खुद सजा दे सकते हैं या यह अधिकार केवल बार काउंसिल के पास है।
विवाद की जड़: गलत टाइटल रिपोर्ट
- आरोप: सिंडिकेट बैंक (अब केनरा बैंक) का आरोप है कि पैनल वकील ने एक प्रॉपर्टी की ‘सर्च और टाइटल रिपोर्ट’ तैयार करते समय लापरवाही बरती। वकील ने यह नहीं बताया कि संपत्ति का एक हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका था।
- बैंक का रुख: बैंक का तर्क है कि इस गलत कानूनी राय की वजह से बैंक को वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा, जो कि फ्रॉड की श्रेणी में आता है।
- परिणाम: IBA ने वकील का नाम अपनी ‘कॉशन लिस्ट’ (क्र. सं. 781) में डाल दिया और सभी वित्तीय संस्थानों को इसे सर्कुलेट कर दिया।
वकील की मुख्य दलीलें
- याचिकाकर्ता वकील ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
- प्रक्रिया का उल्लंघन: वकील का कहना है कि RBI की 2009 की गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का मौका मिला।
- मौलिक अधिकारों का हनन: लिस्ट में नाम आने से न केवल उनकी प्रतिष्ठा (Goodwill) धूमिल हुई है, बल्कि उनके आजीविका कमाने के अधिकार पर भी चोट पहुंची है।
एडवोकेट्स एक्ट और बार काउंसिल (BCI) का स्टैंड
- इस मामले में कोर्ट की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) मनिंदर सिंह और बार काउंसिल ने एक बहुत मजबूत कानूनी तर्क दिया है।
- अनन्य क्षेत्राधिकार (Exclusive Jurisdiction): एडवोकेट्स एक्ट के तहत, किसी भी वकील के खिलाफ ‘प्रोफेशनल मिसकंडक्ट’ (पेशेवर कदाचार) के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का एकमात्र अधिकार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और स्टेट बार काउंसिल्स के पास है।
- IBA का अधिकार क्षेत्र: IBA एक ऐसी संस्था नहीं है जो वकीलों को ब्लैकलिस्ट कर सके। यदि बैंक को कोई शिकायत है, तो उन्हें बार काउंसिल में मामला दर्ज कराना चाहिए।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
- सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने एक जमीनी हकीकत की ओर भी इशारा किया।
मौजूदा तंत्र की प्रभावशीलता: कोर्ट ने बीसीआई और राज्य बार काउंसिल्स द्वारा वकीलों के कदाचार के मामलों को निपटाने के लिए मौजूदा तंत्र की ‘इफेक्टिवनेस’ (प्रभावशीलता) पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट का संकेत था कि क्या बार काउंसिल समय पर और प्रभावी कार्रवाई कर पा रही है?
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | एक पैनल एडवोकेट (इलाहाबाद HC द्वारा राहत न मिलने पर SC पहुँचे)। |
| IBA का तर्क | रिट याचिका विचारणीय नहीं है क्योंकि IBA संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं है। |
| विवादित दस्तावेज | 5 फरवरी, 2020 की ‘कॉशन लिस्ट’। |
| कानूनी सवाल | क्या बैंक खुद किसी वकील को ब्लैकलिस्ट कर सकते हैं या उन्हें BCI जाना चाहिए? |
| वर्तमान स्थिति | फैसला सुरक्षित (Judgment Reserved)। |
वकीलों के सम्मान और बैंकों के जोखिम के बीच संतुलन
सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला यह तय करेगा कि क्या बैंक अपनी सुरक्षा के लिए वकीलों की ब्लैकलिस्टिंग जैसी समानांतर न्याय प्रणाली चला सकते हैं। यदि कोर्ट वकीलों के पक्ष में फैसला देता है, तो बैंकों को हर शिकायत के लिए बार काउंसिल के पास जाना होगा। वहीं, यदि IBA के अधिकार को बरकरार रखा जाता है, तो यह वकीलों की प्रैक्टिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

