Tuesday, August 4, 2026
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Assam Murder Case: जब पुलिस ही कहानी गढ़ने लगे तो सच कहां मिलेगा?…12 लोगों के माथे से मिटाया हत्यारे का दाग, पढ़िए पूरे केस को

Assam Murder Case: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने असम के 2008 के एक भीषण हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए 12 दोषियों को बरी कर दिया है।

अदालत ने पुलिस जांच को स्क्रिप्टेड (पहले से लिखी हुई कहानी) और त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि इस तरह की दोषपूर्ण जांच से निर्दोष व्यक्तियों को “सूली पर चढ़ाने” (Crucified) का खतरा पैदा हो जाता है। यह मामला जुलाई 2008 में असम के गोलपारा जिले में हुई एक जघन्य हत्या से जुड़ा है, जहाँ एक व्यक्ति को बाइक से खींचकर उस पर हमला किया गया और उसका हाथ काट दिया गया था।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: स्क्रिप्टेड इंक्वायरी

  • सुप्रीम कोर्ट ने जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया।
  • घातक परिणाम: अकुशल जांच (Inept Investigation) या स्क्रिप्टेड इंक्वायरी, दोनों ही आपराधिक अभियोजन के लिए घातक हैं; लेकिन बाद वाले के परिणाम तब और भी विनाशकारी होते हैं जब पूरी तरह से निर्दोष व्यक्तियों को सूली पर चढ़ाए जाने की संभावना होती है।”
  • पुलिस की विफलता: कोर्ट ने दुख जताया कि मौके पर पहुँचने के बावजूद पुलिस अधिकारी ने CrPC (अब BNSS) की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। चाहे वह अज्ञानता हो, अक्षमता हो या कोई गलत मंशा—नतीजा यह हुआ कि असली अपराधी छूट गए और 16 लोगों को सालों तक जेल काटनी पड़ी।

जांच की 5 बड़ी खामियां (The Gaping Holes)

  • सुप्रीम कोर्ट ने उन ‘सुराखों’ को गिनाया जिनके कारण पूरा केस गिर गया।
  • FIR में देरी: घटना 8 जुलाई की रात की थी, लेकिन FIR 10 जुलाई को दर्ज की गई। कोर्ट ने माना कि यह देरी अभियुक्तों के नाम तय करने के लिए सोच-विचार (Deliberation) करने का मौका देने जैसी थी।
  • फॉरेंसिक साक्ष्यों की अनदेखी: पुलिस ने हथियार तो जब्त किए, लेकिन उन्हें कभी फॉरेंसिक जांच (CFSL) के लिए नहीं भेजा। न ही उन्हें गवाहों या पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के सामने पेश किया गया।
  • अविश्वसनीय गवाह: अभियोजन पक्ष ने चश्मदीदों के रूप में मृतक के रिश्तेदारों पर भरोसा किया। गवाहों ने दावा किया कि वे भी घायल हुए थे, लेकिन उनकी चोटों का कोई मेडिकल रिकॉर्ड नहीं मिला।
  • खून के नमूने नहीं: घटनास्थल से खून के नमूने एकत्र नहीं किए गए, जो यह साबित कर सकते कि हत्या उसी स्थान पर हुई थी।
  • संपत्ति का स्वामित्व: जब्त की गई मोटरबाइकों के मालिकाना हक का कोई दस्तावेजी सबूत अदालत में पेश नहीं किया गया।

2008 का वो खौफनाक मंजर (Background)

  • हमला: 8 जुलाई 2008 को गोलपारा में कुछ लोगों ने सड़क पर तार बिछाकर बाइक सवारों को रोका।
  • क्रूरता: मृतक की आंखों में मिर्च पाउडर झोंका गया और फिर धारदार हथियारों से उसका बायां हाथ काट दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
  • सजा: निचली अदालत ने 12 लोगों को उम्रकैद सुनाई थी और गुवाहाटी हाई कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विवरणविवरण
मामला2008 असम (गोलपारा) हत्याकांड।
आरोपगैरकानूनी सभा, दंगा और हत्या (Section 302 IPC)।
सुप्रीम कोर्ट बेंचजस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन।
परिणामसभी 12 दोषी बरी; जमानत बांड रद्द।
निर्देशअसम सरकार को पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की सलाह।

संदेह के आधार पर सजा नहीं

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आपराधिक कानून के उस मूल सिद्धांत को दोहराता है कि अपराध चाहे कितना भी जघन्य क्यों न हो, सजा केवल विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही दी जा सकती है। अदालत ने असम के गृह विभाग को निर्देश दिया है कि वह अपने अधिकारियों को जांच की उचित प्रक्रिया के बारे में शिक्षित करे ताकि भविष्य में न्याय का इस तरह “कत्ल” न हो।

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