Protocol Writing: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रोटोकॉल संबंधी स्पष्टीकरण जारी किया है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| किसे ‘Hon’ble’ कहा जाएगा? | किसे ‘Hon’ble’ नहीं कहा जाएगा? |
| मंत्री (केंद्र और राज्य) | सिविल सर्वेंट्स (IAS, IPS, आदि) |
| न्यायाधीश (SC और HC) | पुलिस अधिकारी |
| सांसद (MP) और विधायक (MLA) | निजी सचिव या अन्य कर्मचारी |
| लोकसभा/विधानसभा अध्यक्ष | किसी भी पद का राजपत्रित अधिकारी |
हर्षित शर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा मामला
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में किन पदों पर बैठे व्यक्तियों के नाम के आगे ‘माननीय’ (Hon’ble) लगाना अनिवार्य है और किनके लिए नहीं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह आदेश उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक FIR में पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम के आगे माननीय या श्री न लगाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए दिया। यह मामला हर्षित शर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माननीय शब्द का प्रयोग केवल उन व्यक्तियों के लिए है जो सरकार के तीन अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) में से किसी एक के ‘संप्रभु कार्यों’ (Sovereign Functions) का निर्वहन करते हैं।
किसे ‘Hon’ble’ कहा जा सकता है? (The Entitled List)
- कोर्ट ने उन पदों की सूची दी है जिनके नाम के साथ यह सम्मानजनक शब्द जुड़ना अनिवार्य है।
- न्यायपालिका: सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट के न्यायाधीश।
- कार्यपालिका (संवैधानिक): केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री।
- विधायिका: संसद सदस्य (MP), राज्य विधानसभाओं के सदस्य (MLA), लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति।
- अन्य: प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान संवैधानिक पदाधिकारी।
सिविल सर्वेंट्स (IAS/IPS) के लिए ‘Hon’ble’ नहीं
- कोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया।
- अधिकारी बनाम पदाधिकारी: अदालत ने कहा कि सिविल सर्वेंट (सरकारी अधिकारी), चाहे वे कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हों, अपने नाम के साथ ‘माननीय’ (Hon’ble) शब्द का उपयोग करने के पात्र नहीं हैं।
- तर्क: यह सम्मान केवल उन ‘संवैधानिक पदाधिकारियों’ के लिए आरक्षित है जो संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
मामला क्या था? (The Context of Dispute)
- FIR में चूक: यूपी पुलिस ने एक एफआईआर दर्ज की थी जिसमें अनुराग ठाकुर का जिक्र था (वे आरोपी नहीं थे, लेकिन उनका नाम संदर्भ में आया था)। पुलिस ने उनके नाम के आगे ‘Hon’ble’ या ‘Mr’ नहीं लगाया था।
- कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत नाराजगी या परिवार से जान-पहचान होने के आधार पर आप उस संवैधानिक सम्मान (Honorific) को नहीं हटा सकते जिसके वे हकदार हैं।
- राज्य का स्पष्टीकरण: यूपी सरकार ने जांच के बाद बताया कि शिकायतकर्ता को सांसदों के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए मामला बंद कर दिया।
संवैधानिक मर्यादा सर्वोपरि
अदालत ने जोर देकर कहा कि संप्रभु पदों पर बैठे व्यक्तियों को हर परिस्थिति में उसी सम्मान के साथ संबोधित किया जाना चाहिए। यह केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस संवैधानिक संस्था के प्रति सम्मान है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।
सम्मान पदों का, व्यक्तियों का नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारतीय लोकतंत्र में ‘Hon’ble’ शब्द का प्रयोग किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत महानता के लिए नहीं, बल्कि उसके द्वारा धारित संवैधानिक पद की गरिमा के लिए किया जाता है। पुलिस और प्रशासन को सरकारी दस्तावेजों (जैसे FIR) में इस प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है।

