Sunday, September 20, 2026
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Psychopathic Allegation: जज डॉक्टर नहीं होते, फिर पत्नी को साइको कहकर पति के पास जाने से क्यों रोका…पढ़ें पूरी खबर

Psychopathic Allegation: तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस मौशुमी भट्टाचार्य और जस्टिस गादि प्रवीण कुमार की खंडपीठ ने एक फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए निचली अदालत को कड़ी फटकार लगाई है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
निचली अदालत का दावापत्नी को Psychic Disorder है, इसलिए उसे पति से दूर रखा जाए।
हाई कोर्ट का रुखबिना डॉक्टर की रिपोर्ट के कोर्ट किसी को मानसिक बीमार नहीं कह सकता।
शब्दावली पर कड़ा ऐतराज‘Psychopathic’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल व्यक्ति की गरिमा के खिलाफ है।
फैसलापत्नी पर लगी सभी पाबंदियां हटाई गईं और निचली अदालत के आदेश को रद्द किया गया।

पति के पास पत्नी के जाने पर लगाई थी रोक

दरअसल, फैमिली कोर्ट ने बिना किसी मेडिकल सबूत के एक पत्नी को साइकोपैथिक (Psychopathic) और मानसिक विकार से ग्रस्त घोषित कर दिया था और उसे अपने पति के पास जाने से रोक दिया था। अदालत ने इस आदेश को कलंक लगाने वाला (Stigmatic) और तर्कहीन करार दिया। यह मामला एक तलाक की याचिका से उपजा था, जहाँ पति ने अपनी पत्नी पर क्रूरता और हिंसक व्यवहार का आरोप लगाते हुए उसे मानसिक रूप से बीमार बताया था।

हाई कोर्ट की मुख्य आपत्ति: बिना सबूत के लेबल लगाना

  • अदालत ने निचली अदालत द्वारा इस्तेमाल की गई शब्दावली पर गंभीर सवाल उठाए।
  • मेडिकल सबूत की कमी: कोर्ट ने कहा कि पत्नी को ‘साइकियाट्रिक’ (Psychiatric) या ‘साइकोपैथिक’ कहना पूरी तरह से निराधार है। ऐसी किसी भी स्थिति का निर्धारण केवल विशेषज्ञ चिकित्सा साक्ष्यों (Medical Evidence) और रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।
  • जजों की सीमा: “लड़ते हुए जोड़ों के बीच होने वाली दैनिक घटनाओं के आधार पर मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाना कोर्ट का काम नहीं है। कोर्ट ऐसी खोज करने के लिए सबसे कम सुसज्जित (Least Equipped) होते हैं।”

“साइको” शब्द का ढीला इस्तेमाल और उसके परिणाम

  • अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि कैसे शब्दों का गलत इस्तेमाल किसी के जीवन को तबाह कर सकता है।
  • सामाजिक कलंक: कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को बिना मुकदमे के ‘दोषी’ घोषित कर देना और उस पर ‘मानसिक रोगी’ का ठप्पा लगा देना उसके व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डालता है।
  • गलत धारणा: फैमिली कोर्ट ने ‘Psychic’ शब्द का इस्तेमाल किया, जबकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस शब्द के अलग मायने हो सकते हैं और यह जरूरी नहीं कि कोई नकारात्मक विशेषता ही हो।

पाबंदी को बताया ‘असाधारण उपाय’

  • फैमिली कोर्ट ने पत्नी को पति के घर और कार्यस्थल के पास जाने से भी रोक दिया था।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन: हाई कोर्ट ने इसे लेकर कहा, एक जीवनसाथी को दूसरे के पास जाने से रोकना एक ‘असाधारण उपाय’ है, जिसके लिए बहुत ठोस और उच्च स्तर के औचित्य (Justification) की आवश्यकता होती है।
  • एकतरफा फैसला: हाई कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने केवल पति के दावों पर भरोसा किया और पत्नी के पक्ष को नजरअंदाज कर दिया। यह आदेश पूरी तरह से एकतरफा और बिना किसी कानूनी आधार के था।

न्यायपालिका के लिए एक सबक

तेलंगाना हाई कोर्ट का यह फैसला निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश है। यह याद दिलाता है कि वैवाहिक विवादों में गुस्से या झगड़े को मानसिक बीमारी मान लेना एक गंभीर न्यायिक भूल है। अदालतों को विशेषज्ञ राय (Expert Opinion) के बिना चिकित्सा संबंधी निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए, क्योंकि उनके शब्द किसी व्यक्ति के चरित्र और भविष्य पर अमिट दाग लगा सकते हैं।

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