HomeDelhi High CourtMaintenance case: कमाने वाले की सुविधा के अनुसार गुजारा भत्ता टाला जा...

Maintenance case: कमाने वाले की सुविधा के अनुसार गुजारा भत्ता टाला जा सके…क्यूं कहा हाईकोर्ट ने ऐसा

Maintenance case: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को उसकी अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटी को अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश देते हुए कहा कि आर्थिक सहयोग में देरी करना, सम्मान से इनकार करने जैसा है।

पारिवारिक अदालत का आदेश बरकरार

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें व्यक्ति को हर महीने 45,000 रुपये (पत्नी और बेटी के लिए 22,500-22,500 रुपये) अंतरिम भत्ते के तौर पर देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, कोर्ट ने बेटी के लिए यह राशि घटाकर 17,500 रुपये कर दी, लेकिन पत्नी के लिए राशि यथावत रखी।

वित्तीय सहयोग में देरी का मतलब है सम्मान का नुकसान

1 जुलाई को दिए गए फैसले में कोर्ट ने कहा, वित्तीय सहयोग में देरी का मतलब है सम्मान का नुकसान। यह कोर्ट इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि समय पर गुजारा भत्ता देना केवल जीविका नहीं, बल्कि उन लोगों की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक है जो इसके कानूनी हकदार हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ता केवल आर्थिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह एक नैतिक और कानूनी दायित्व है जो आश्रित पत्नी और बच्चे की गरिमा व सुरक्षा बनाए रखने के लिए होता है।

देरी से मिलता सहयोग, सबसे पहले गरिमा को प्रभावित करता है

कोर्ट ने कहा कि जब कमाने वाला पति अपनी सहूलियत के हिसाब से गुजारा भत्ता देता है, तो इसके मूल उद्देश्य पर ही चोट पहुंचती है। पत्नी और बच्ची की जरूरतें उसी दिन की होती हैं, जब वे उत्पन्न होती हैं उन्हें टाला नहीं जा सकता। पति की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि केवल एक महीने का बकाया है और जानबूझकर कोई चूक नहीं हुई। लेकिन महिला की ओर से कोर्ट में पेश एमिकस क्यूरी ने कहा कि एक दिन की देरी भी पत्नी पर भारी पड़ती है, जो खुद और अपनी बेटी का पालन-पोषण संघर्ष के साथ कर रही है। कोर्ट ने कहा, पति नियमित आमदनी और संसाधनों की शांति में सोता रहा, वहीं पत्नी चुपचाप संघर्ष करती रही कि अगले दिन की जरूरतें कैसे पूरी होंगी।

गुजारा भत्ता कोई दया या चैरिटी नहीं

कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता का मकसद महिला और बच्ची की गरिमा से जीवन जीने की मौलिक जरूरतों भोजन, आवास, कपड़े, स्वास्थ्य और शिक्षा को पूरा करना है। यह कोई दया या चैरिटी नहीं है जिसे कमाने वाले की सुविधा के अनुसार टाला जा सके। महिला ने कोर्ट में अपनी असहायता, डर और आर्थिक असुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी, जो पति की ओर से समय पर भुगतान न करने के कारण पैदा हुई। कोर्ट ने माना कि कानून बनाने का मकसद ही ऐसा डर और अस्थिरता रोकना था।

पति की दलील को किया खारिज

पति की यह दलील भी कोर्ट ने खारिज कर दी कि वह अपने माता-पिता का खर्च उठा रहा है और गांव में मकान बनाने के लिए भारी किस्तें चुका रहा है। कोर्ट ने साफ कहा कि “पत्नी और बच्चे को मिलने वाले कानूनी अधिकार को घर की ईएमआई की वजह से नहीं रोका जा सकता। कोर्ट का यह फैसला, महिला और बच्चे की गरिमा व न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के संवैधानिक अधिकार को मजबूती से रेखांकित करता है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
mist
18 ° C
18 °
18 °
94 %
0kmh
20 %
Sat
18 °
Sun
28 °
Mon
34 °
Tue
36 °
Wed
37 °

Recent Comments