Tuesday, August 4, 2026
HomeLaworder HindiAbility of the judge: ऊपरी अदालत द्वारा आदेश पलटना…निचली अदालत के जज की...

Ability of the judge: ऊपरी अदालत द्वारा आदेश पलटना…निचली अदालत के जज की क्षमता पर सवाल नहीं

Ability of the judge: दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर एक बेहद मानवीय और कानूनी स्पष्टता वाला फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई ऊपरी अदालत (हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट) निचली अदालत के किसी आदेश पर रोक लगाती है, उसमें संशोधन करती है या उसे रद्द करती है, तो इसे उस जज की योग्यता, क्षमता या सत्यनिष्ठा पर टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 12 पन्नों के अपने फैसले में कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) हमारी अदालती संरचना का एक अंतर्निहित हिस्सा है और यह सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अदालत ने साफ कर दिया कि जजों के फैसले कानून की व्याख्या पर आधारित होते हैं, जिनमें मतभेद संभव है। एक आदेश का गलत पाया जाना जज को अयोग्य नहीं बनाता, बल्कि यह कानूनी सुधार की एक प्रक्रिया है।

जजों की सत्यनिष्ठा पर संदेह करना असंभव बना देगा काम

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि जजों को बिना किसी डर के काम करने की जरूरत है।
  • स्वाभाविक प्रक्रिया: जस्टिस शर्मा ने कहा, “तथ्य यह है कि किसी आदेश में हस्तक्षेप किया गया है, वह अपने आप में आदेश पारित करने वाले न्यायाधीश की क्षमता पर प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता।”
  • कामकाज में बाधा: यदि हर संशोधित आदेश को जज की ईमानदारी पर सवाल मान लिया जाए, तो ऊपरी अदालतों के लिए मामलों का निपटारा करना असंभव हो जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि: एक न्यायिक अधिकारी की पीड़ा

  • यह फैसला एक न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) की याचिका पर आया है, जिन्होंने मार्च 2023 के एक फैसले में अपने खिलाफ की गई ‘प्रतिकूल टिप्पणियों’ को हटाने की मांग की थी।
  • अधिकारी की दलील: अधिकारी का कहना था कि हाई कोर्ट ने उनके न्यायिक निर्देशों को ‘असमान’ (Disproportionate) बताया था।
  • करियर पर असर: इस टिप्पणी के कारण उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) खराब हुई, उनका तबादला जिला न्यायपालिका में कर दिया गया और उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची।
  • शिकायत: उन्होंने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने उन्हें सुने बिना और बिना नोटिस दिए ही उनके खिलाफ टिप्पणी कर दी थी।

कोर्ट का निर्णय: “चिंता जायज, पर टिप्पणी व्यक्तिगत नहीं”

  • जस्टिस शर्मा ने मार्च 2023 के मूल फैसले को वापस लेने से तो इनकार कर दिया, लेकिन अधिकारी की चिंताओं को दूर करते हुए कुछ महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिए।
  • नाम का उल्लेख नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल फैसले में कहीं भी जज का नाम नहीं लिया गया था, केवल ‘ट्रायल कोर्ट’ का संदर्भ दिया गया था क्योंकि कोर्ट ‘आदेश की वैधता’ की जांच कर रहा था, न कि किसी व्यक्ति के आचरण की।
  • ACR पर असर नहीं: कोर्ट ने आदेश दिया कि मार्च 2023 की टिप्पणियों को अधिकारी की ACR में ‘प्रतिकूल टिप्पणी’ के रूप में न गिना जाए और न ही इसे उनकी क्षमता या अखंडता पर सवाल माना जाए।

केजरीवाल मामले के संदर्भ में महत्व

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आबकारी नीति मामले के अन्य आरोपियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच से मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर करने की मांग की थी। उन्होंने निष्पक्ष सुनवाई की आशंका जताई थी। ऐसे में कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता के प्रति एक कड़ा संदेश है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
light rain
31.1 ° C
31.1 °
31.1 °
69 %
3.3kmh
100 %
Tue
31 °
Wed
32 °
Thu
32 °
Fri
34 °
Sat
35 °