Bombay High court
Padma Awards: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कारों के इस्तेमाल को लेकर बड़ी हिदायत दी है।
डॉक्टर शरद एम. हार्डीकर के नाम के आगे ‘पद्मश्री’ लिखे होने पर आपत्ति
जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन ने एक याचिका के शीर्षक (Case Title) में डॉक्टर शरद एम. हार्डीकर के नाम के आगे ‘पद्मश्री’ लिखे होने पर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि अदालतों और पक्षकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों का इस्तेमाल किसी उपाधि या टाइटल की तरह न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘भारत रत्न’ और ‘पद्म’ पुरस्कारों को नाम के आगे (Prefix) या पीछे (Suffix) नहीं जोड़ा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अनुच्छेद 18(1) का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा ‘बालाजी राघवन बनाम भारत सरकार’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया।
यह है फैसले की मुख्य बातें
- सम्मान बनाम उपाधि: संविधान के अनुच्छेद 18(1) के तहत उपाधियों (Titles) का अंत कर दिया गया है। ‘पद्मश्री’ या ‘भारत रत्न’ राज्य द्वारा दिए गए सम्मान हैं, न कि राजा-महाराजाओं के समय जैसी उपाधियाँ।
- इस्तेमाल पर पाबंदी: यदि कोई व्यक्ति इन पुरस्कारों को अपने नाम के आगे या पीछे लगाकर उपयोग करता है, तो उससे यह सम्मान वापस भी लिया जा सकता है।
- अनुच्छेद 141 की बाध्यता: हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित यह कानून पूरे देश में लागू है और अदालती कार्यवाही के दौरान इसका सख्ती से पालन होना चाहिए।
यह था मामला
अदालत पुणे के एक ट्रस्ट से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ट्रस्टियों की बैठक की तारीख में सुधार (Correction) की मांग की गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार बैठक 21 जनवरी 2016 को हुई थी, लेकिन रिपोर्ट में इसे 20 जनवरी दिखाया गया था। कोर्ट ने इस तकनीकी सुधार की अनुमति दे दी, लेकिन याचिका में ‘पद्मश्री’ शब्द के गलत इस्तेमाल पर कानून स्पष्ट किया।
अवार्ड वापस लेने का भी है प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यदि कोई अवार्ड विजेता बार-बार मना करने के बाद भी अपने नाम के साथ अवार्ड का इस्तेमाल करता है, तो केंद्र सरकार के पास रेगुलेशन 10 के तहत उसका सम्मान जब्त करने (Forfeit) का अधिकार है।





