Sunday, August 16, 2026
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Violence targeting northeastern citizens: हम भारतीय हैं, इसे साबित करने के लिए और क्या सर्टिफिकेट चाहिए?

Violence targeting northeastern citizens: पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों के खिलाफ हो रहे नस्लीय भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।

छात्र एंजेल चकमा की नस्लीय हमले में हुई निर्मम हत्या के बाद उठाया गया मामला

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में अदालत से दखल देने की मांग की गई है ताकि इन नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सके। यह कदम देहरादून में त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की नस्लीय हमले में हुई निर्मम हत्या के बाद उठाया गया है। एडवोकेट अनूप प्रकाश अवस्थी द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया गया है।

‘एंजेल के आखिरी शब्द: क्या हम भारतीय नहीं?’

याचिका में एंजेल चकमा की मौत के समय के हृदयविदारक घटनाक्रम का जिक्र किया गया है। हमले के दौरान एंजेल ने चिल्लाकर कहा था— “हम भारतीय हैं। हमें यह साबित करने के लिए और कौन सा सर्टिफिकेट दिखाना चाहिए?” ये उसके आखिरी शब्द थे, जिसके बाद हमलावरों ने उसे और उसके भाई को चाकू मार दिया। एंजेल की 14 दिनों तक अस्पताल में मौत से जंग लड़ने के बाद मौत हो गई।

PIL में की गई 3 प्रमुख मांगें

  • नस्लीय कानून के लिए गाइडलाइंस: जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक कोर्ट ऐसी गाइडलाइंस जारी करे जो ‘नस्लीय अपशब्दों’ (Racial Slurs) को ‘हेट क्राइम’ की श्रेणी में रखे और सजा तय करे।
  • नोडल एजेंसी का गठन: केंद्र और राज्य स्तर पर एक स्थायी आयोग या निदेशालय बनाया जाए, जहां नस्लीय अपराधों की शिकायत और निवारण हो सके।
  • स्पेशल पुलिस यूनिट: हर जिले और महानगर में नस्लीय अपराधों से निपटने के लिए एक समर्पित स्पेशल पुलिस यूनिट बनाई जाए।

साधारण अपराध मानकर केस को कमजोर करती है पुलिस

याचिका में आरोप लगाया गया है कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच के शुरुआती स्तर पर ‘नस्लीय भेदभाव’ को दर्ज करने का कोई तंत्र नहीं है। नतीजतन, ऐसे मामलों को ‘साधारण अपराध’ मानकर दर्ज किया जाता है। इससे अपराधी का असली मकसद (नफरत) छिप जाता है और मामले की संवैधानिक गंभीरता खत्म हो जाती है।

पुराना पैटर्न: निदो तानियाम से एंजेल तक

याचिका में 2014 के चर्चित निदो तानियाम मामले का भी जिक्र किया गया है। कोर्ट को बताया गया कि केंद्र सरकार ने संसद में ऐसे हमलों को स्वीकार तो किया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस विधायी या संस्थागत ढांचा (Legislative framework) तैयार नहीं किया गया है।

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