Tuesday, September 8, 2026
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Advocates Only: सभी वकीलों के लिए अहम…पॉवर ऑफ अटॉर्नी से कोई वकील नहीं, केवल पंजीकृत वकील बहस करेंगे

Advocates Only: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालत में पैरवी करने और बहस करने का अधिकार केवल पंजीकृत वकीलों (Enrolled Advocates) को ही है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य मुद्दाक्या पॉवर ऑफ अटॉर्नी धारक वकील की तरह बहस कर सकता है?
कोर्ट का जवाबबिल्कुल नहीं। यह अधिकार केवल पंजीकृत वकीलों के पास सुरक्षित है।
कानूनी आधारएडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 29 और 33।
निष्कर्षपॉवर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग प्रशासनिक कार्यों के लिए हो सकता है, लेकिन ‘वकालत’ के लिए नहीं।

वकालत के पेशे की गरिमा रेखांकित किया गया

हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कानपुर के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए वकालत के पेशे की गरिमा और कानूनी नियमों को रेखांकित किया है। कोर्ट ने ‘पॉवर ऑफ अटॉर्नी’ (Power of Attorney) के आधार पर मुकदमों में पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया।

मामला क्या था? (The Background)

  • दावा: याचिकाकर्ता, जो स्वयं वकील नहीं है, ने दावा किया कि वह ट्रायल कोर्ट में ‘मुख्तार’ या ‘प्लीडर’ के रूप में पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करता रहा है।
  • विवाद: 2019 में कानपुर की एक अदालत ने उसे कानूनी प्रतिनिधि के रूप में पेश होने से मना कर दिया था। इस फैसले को उसने हाई कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि ‘पॉवर ऑफ अटॉर्नी’ के बल पर उसे बहस करने का अधिकार है।

कोर्ट का फैसला और ‘एडवोकेट एक्ट

  • हाई कोर्ट ने एडवोकेट एक्ट, 1961 की धाराओं (Section 29 और 33) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया।
  • केवल एक वर्ग: कानून केवल एक ही वर्ग को कानूनी प्रेक्टिस की अनुमति देता है और वह है— एडवोकेट, जिनका पंजीकरण बार काउंसिल में हो।
  • अधिकार बनाम अनुमति: कोर्ट ने माना कि विशेष परिस्थितियों में अदालत किसी गैर-वकील को बोलने की अनुमति दे सकती है, लेकिन यह ‘अदालत का विवेक’ (Discretion) है, याचिकाकर्ता का ‘कानूनी अधिकार’ (Right) नहीं।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अधूरा ज्ञान न्याय के लिए घातक

सुनवाई के दौरान बेंच ने कानून के गलत इस्तेमाल और बिना योग्यता के पैरवी करने पर गंभीर चिंता जताई। “कानून का आधा-अधूरा ज्ञान खुद को पहुंचाई गई चोट के समान है… यह अंततः न्याय की हत्या का कारण बनता है।

न्याय की गुणवत्ता सुनिश्चित करना

यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो बिना कानूनी डिग्री और पंजीकरण के अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्याय की प्रक्रिया को केवल योग्य पेशेवरों के माध्यम से ही चलाया जाना चाहिए ताकि ‘न्याय की हत्या’ न हो।

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