Cheating vs Breach of Trust: सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी (Cheating) के मामलों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
कोर्ट ने कहा कि केवल पोस्ट-डेटेड चेक (Post-dated cheque) का बाउंस होना इस बात का सबूत नहीं है कि व्यक्ति की नीयत शुरू से ही खराब थी।
पूरा मामला क्या था?
- (Background)यह विवाद एक फिल्म प्रोजेक्ट में निवेश से जुड़ा था।
- निवेश: शिकायतकर्ता ने एक फिल्म बनाने के लिए पैसे लगाए थे, इस उम्मीद में कि उसे 30% मुनाफा मिलेगा।
- घाटा: फिल्म फ्लॉप हो गई या मुनाफा नहीं कमा पाई। इसके बाद आरोपी (फिल्म मेकर) ने मूल राशि चुकाने के लिए 24-24 लाख रुपये के दो पोस्ट-डेटेड चेक दिए।
- विवाद: ये चेक बैंक में ‘कम बैलेंस’ की वजह से बाउंस हो गए। शिकायतकर्ता ने धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत केस दर्ज करा दिया।
- हाई कोर्ट का रुख: मद्रास हाई कोर्ट ने केस को रद्द करने से मना कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: ‘धोखाधड़ी’ कब मानी जाएगी?
जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कानून को इस तरह समझाया
- नीयत (Intent) कब की होनी चाहिए?धोखाधड़ी (Section 420 IPC) का केस तब बनता है जब आरोपी की बेईमानी की नीयत लेनदेन के शुरू (At the inception) में हो। अगर शुरुआत में नीयत साफ थी लेकिन बाद में बिजनेस में घाटा होने के कारण वादे पूरे नहीं हो सके, तो इसे ‘धोखाधड़ी’ नहीं, बल्कि ‘वादा खिलाफी’ (Breach of Promise) माना जाएगा।
- फिल्म बिजनेस का जोखिमकोर्ट ने टिप्पणी की: “फिल्म बनाना एक हाई-रिस्क बिजनेस है। कोई नहीं जान सकता कि फिल्म हिट होगी या फ्लॉप।” चूंकि फिल्म वास्तव में रिलीज हुई थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि फिल्म मेकर ने पैसा ठगने के लिए झूठ बोला था।
पोस्ट-डेटेड चेक पर कोर्ट की विशेष टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पोस्ट-डेटेड चेक जारी करने और धोखाधड़ी में क्या अंतर है।
- सुरक्षा के लिए चेक: आमतौर पर पोस्ट-डेटेड चेक भविष्य की देनदारी चुकाने या सुरक्षा (Security) के तौर पर दिए जाते हैं।
- भविष्य की उम्मीद: चेक देते समय व्यक्ति को उम्मीद हो सकती है कि उस तारीख तक उसके खाते में पैसे आ जाएंगे। अगर पैसे नहीं आ पाते, तो यह ‘धोखाधड़ी’ नहीं है।Retrospective Presumption: चेक बाउंस होने के आधार पर हम यह नहीं मान सकते कि लेनदेन के पहले दिन ही व्यक्ति की नीयत खराब थी।
“चेक बाउंस होने पर ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट’ की धारा 138 के तहत कार्यवाही हो सकती है, लेकिन यह अपने आप में IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) का अपराध नहीं बन जाता।”
सुप्रीम कोर्ट
निष्कर्ष
सिविल विवाद को क्रिमिनल रंग न देंसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से सिविल प्रकृति (Civil Nature) का है जो एक असफल व्यापारिक सौदे से पैदा हुआ है। ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’ (Abuse of process) है। कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामलों को रद्द कर दिया।
संक्षेप में: चेक बाउंस और कानून
स्थिति लागू कानून प्रकृति
खाते में पैसे न होने पर चेक बाउंस Section 138, NI Act अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal)
शुरू से ही ठगने की नीयत से चेक देना Section 420, IPC पूरी तरह आपराधिक (Criminal)
व्यापारिक घाटे के कारण भुगतान न होना सिविल कोर्ट सिविल (Civil)
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NO. 1470 OF 2026
(Arising out of SLP Criminal No. 10478 of 2023)
V. GANESAN VERSUS STATE REP BY THE SUB INSPECTOR OF POLICE & ANR.

