Supreme-Court
CONTEMPT-JUDGE: सुप्रीम कोर्ट ने वादकारियों और वकीलों द्वारा न्यायाधीशों पर मनमाने और आपत्तिजनक आरोप लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है।
वकीलों को दी कड़ी चेतावनी
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी तेलंगाना हाईकोर्ट के एक मामले से जुड़े अवमानना कार्यवाही को बंद करते हुए की। अदालत ने कहा कि जब फैसले पक्ष में नहीं आते, तब इस तरह के “घृणित और अपमानजनक आरोप” लगाए जाना न्यायपालिका की प्रतिष्ठा के लिए बेहद खतरनाक है।अदालत ने याचिकाकर्ता एन. पेड्डी राजू और उनके दो वकीलों को चेतावनी दी कि इस तरह का आचरण “कानून के शासन की नींव को कमजोर करता है और इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।
वकील कोर्ट के अधिकारी होते हैं, उन्हें समझना होगा
पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित हाईकोर्ट न्यायाधीश ने इन तीनों की माफी स्वीकार कर ली है, इसलिए अवमानना कार्यवाही समाप्त की जाती है। CJI गवई ने आदेश में कहा, “हाल के दिनों में यह चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि जब अदालत मनचाहा आदेश नहीं देती, तो न्यायाधीशों पर घृणित और आधारहीन आरोप लगाए जाते हैं। ऐसी प्रथा की कड़ी निंदा होनी चाहिए।” अदालत ने कहा कि वकील ‘कोर्ट के अधिकारी’ होते हैं और उन्हें अपनी याचिकाओं में किसी न्यायाधीश के खिलाफ अपमानजनक या झूठे आरोप लगाने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए।
तेलंगाना हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति के खिलाफ टिप्पणी दी थी
पीठ ने कहा, “कानून की गरिमा दंड देने में नहीं, बल्कि सच्चे मन से माफी मांगने पर क्षमा करने में निहित है। चूंकि संबंधित न्यायाधीश ने माफी स्वीकार कर ली है, इसलिए आगे की कार्रवाई नहीं की जाएगी।” यह मामला उस समय उठा जब एन. पेड्डी राजू और उनके वकीलों ने तेलंगाना हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। यह याचिका एक ट्रांसफर पिटिशन से जुड़ी थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि न्यायाधीश ने मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ दर्ज एससी/एसटी एक्ट के मामले को रद्द करते समय पक्षपात किया।
गलत आरोप से जनता का विश्वास कमजोर होता है: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आरोप न केवल जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं, बल्कि अदालतों की गरिमा को भी ठेस पहुंचाते हैं। अदालत ने दोहराया, “वकीलों का यह दायित्व है कि वे न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखें।” गौरतलब है कि इससे पहले 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश “किसी भी रूप में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से कम नहीं हैं” और आरोप लगाने वाले वकीलों को बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया था।
पक्षकार के अलावा वकील भी जिम्मेदार
CJI ने 1954 के एक संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “सिर्फ पक्षकार ही नहीं, बल्कि ऐसे अपमानजनक याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने वाले वकील भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं।” अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि संबंधित न्यायाधीश के समक्ष मामला पुनः खोला जाए ताकि वे अंतिम आदेश पारित कर सकें।






