COUPLE-DAYCARE: मुंबई की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने यह कहते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा है कि अपने बच्चों को गरिमा के साथ पालना माता-पिता की जिम्मेदारी है।
घरेलू हिंसा के मामले में सुनवाई
मजिस्ट्रेट ने पत्नी को अंतरिम राहत देते हुए पति को इन खर्चों के लिए ₹12,000 प्रति माह भुगतान करने को कहा था, जिसे अब सत्र अदालत ने भी सही माना है। घरेलू हिंसा के एक मामले में कोर्ट ने व्यक्ति को अपनी जुड़वां बेटियों के लिए फुल-टाइम मेड (नौकरानी) या डे-केयर का खर्च उठाने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
- विवाह: कपल ने 2017 में विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत शादी की थी।
- विवाद: महिला की शिकायत के अनुसार, वे दोनों एतिहाद एयरवेज (Etihad Airways) में काम करते थे और अबू धाबी में रहते थे। वहां पति और सास के उत्पीड़न के कारण वह अवसाद (Depression) का शिकार हो गई और उसकी नौकरी चली गई।
- वापसी: बाद में पति की भी नौकरी चली गई और वे मुंबई लौट आए। महिला ने 2021 में घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया और बच्चों की देखभाल के खर्च के लिए अंतरिम राहत मांगी।
दोनों पक्षों के तर्क
- पत्नी का तर्क: वह वर्तमान में केबिन क्रू (Cabin Crew) के रूप में काम कर रही है और अकेले अपनी दो छोटी बेटियों की देखभाल के साथ नौकरी नहीं कर सकती, खासकर तब जब उसकी अपनी माँ रीढ़ की हड्डी की समस्या से जूझ रही हैं।
- पति का तर्क: पति ने दावों को चुनौती देते हुए कहा कि पत्नी महीने में लगभग ₹2 लाख कमाती है और उसके पास भारी निवेश है। वहीं, वह खुद दुबई में अपने भाई के “रहमो-करम” पर रह रहा है और उसकी तनख्वाह ₹85,000 है। उसने घरेलू हिंसा के आरोपों से इनकार किया और आरोप लगाया कि पत्नी बच्चों को “पैसे ऐंठने के हथियार” के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
यह रहा अदालत का निर्देश
दिंडोशी स्थित अतिरिक्त सत्र अदालत के न्यायाधीश एम. मोहिउद्दीन एम. ए. ने पति की याचिका को खारिज करते हुए कहा, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ (DV Act) मजिस्ट्रेटों को ऐसे मामलों में मौद्रिक राहत (Monetary Relief) प्रदान करने के व्यापक अधिकार देता है। परिस्थितियों को देखते हुए, मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित ₹12,000 प्रति माह की राशि “न्यायसंगत और उचित” है। बच्चों का गरिमापूर्ण पालन-पोषण करना पिता की जिम्मेदारी है, भले ही माँ कमा रही हो।

