Guj electricity: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (GUVNL) की अपील खारिज कर दी।
पवन ऊर्जा खरीद के लिए अलग टैरिफ तय कराने का मामला
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि GUVNL सिर्फ अपने व्यावसायिक हितों के आधार पर काम नहीं कर सकता। एक राज्य की एजेंसी होने के नाते उसका आचरण एक आदर्श नागरिक जैसा होना चाहिए। GUVNL ने सितंबर 2015 में अपीलीय विद्युत न्यायाधिकरण (APTEL) के फैसले को चुनौती दी थी। APTEL ने गुजरात विद्युत नियामक आयोग (GERC) के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें चार कंपनियों को GUVNL से पवन ऊर्जा खरीद के लिए अलग टैरिफ तय कराने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि GUVNL को सरकार की रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने की नीति का पालन करना चाहिए। वह किसी निजी कंपनी की तरह सिर्फ मुनाफे के नजरिए से काम नहीं कर सकता।
GUVNL का व्यवहार अनुचित: बेंच
बेंच ने कहा कि GUVNL ने चार कंपनियों के साथ “स्पष्ट रूप से अनुचित व्यवहार” किया। वह उन्हें उस टैरिफ से बांधना चाहता था, जो उनके लिए लागू ही नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि GUVNL का यह रवैया “शायलॉक” जैसा है, जो उस पर अच्छा प्रभाव नहीं डालता।
पुराना टैरिफ लागू नहीं हो सकता: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि GUVNL यह दावा नहीं कर सकता कि कंपनियां GERC से टैरिफ निर्धारण की मांग नहीं कर सकतीं, क्योंकि उन्होंने पहले से पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) साइन कर रखे हैं। GUVNL यह साबित नहीं कर पाया कि कंपनियों ने तेज डिप्रिसिएशन (accelerated depreciation) का विकल्प चुना था। इसलिए वह उन्हें उस टैरिफ से नहीं बांध सकता, जो सिर्फ तेज डिप्रिसिएशन लेने वाली परियोजनाओं पर लागू होता है।
GERC और APTEL के आदेश सही: बेंच
बेंच ने कहा कि GERC पहले ही स्पष्ट कर चुका था कि 3.56 रुपए प्रति यूनिट का टैरिफ सिर्फ उन्हीं पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर लागू होगा, जिन्होंने तेज डिप्रिसिएशन का लाभ लिया है। जिन कंपनियों ने यह लाभ नहीं लिया, उन पर यह टैरिफ लागू नहीं हो सकता। इसलिए GERC और APTEL के आदेशों में कोई दखल देने की जरूरत नहीं है।
राज्य की नीति से अलग नहीं हो सकता GUVNL: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि GUVNL एक सरकारी संस्था है और उसे राज्य की नीतियों का पालन करना ही होगा। वह किसी निजी कंपनी की तरह सिर्फ मुनाफे के आधार पर फैसले नहीं ले सकता।
फरवरी 2023 का आदेश भी रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2023 में दिया गया अपना अंतरिम आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि GERC टैरिफ निर्धारण की सुनवाई तो कर सकता है, लेकिन अंतिम आदेश सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना नहीं दे सकता। अब यह शर्त हटा दी गई है।

