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JUDGE THREAT: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 37 साल पुराने एक गंभीर मामले को फिर से खोल दिया है।
सेशन जज को दी थी धमकी
एक पूर्व पुलिस अधीक्षक (SP) ने कथित तौर पर एक केस की सुनवाई के दौरान तत्कालीन सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) को थाने तक खींच लाने की धमकी दी थी।कोर्ट ने कहा कि केवल समय बीत जाने के कारण SP के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की पीठ ललितपुर के नाराहट पुलिस स्टेशन में दर्ज एक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए बृंदावन और अन्य द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए इस तथ्य से अवगत हुई।
क्या थी SP की ‘जुर्रत’?
कोर्ट ने दशकों पुराने फैसले में पीठासीन अधिकारी द्वारा दर्ज की गई टिप्पणियों पर ध्यान दिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा, “टिप्पणियां इस हद तक जाती हैं कि बीके भोला, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, ललितपुर ने इतनी जुर्रत (Audacity) और हिम्मत दिखाई कि उन्होंने विद्वान ट्रायल जज को धमकी दी कि यदि उन्होंने पुलिस से कुछ रिकॉर्ड, कुछ वायरलेस संदेश मंगाए, या SP को बचाव पक्ष के गवाह के रूप में पेश होने के लिए मजबूर किया, तो वह उन्हें (जज को) थाने तक खींच लाएंगे।” कोर्ट ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा कि सत्र न्यायाधीश ने पाया था कि ललितपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने “एक गुंडे की तरह व्यवहार किया था और विद्वान ट्रायल जज को धमकाया था।”
HC का सख्त रुख
न्यायालय ने पाया कि उस समय ट्रायल जज ने अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन वह “आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने के लिए इस न्यायालय को रेफरेंस न देने में दयालु थे”। पीठ ने इस गंभीर आचरण को नजरअंदाज न करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में DGP को तत्कालीन SP (बीके भोला) की वर्तमान स्थिति और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण देना होगा। कोर्ट के इस कदम से 37 साल पुराने एक ऐसे मामले को न्याय के दायरे में लाने की उम्मीद जगी है, जिसमें न्यायपालिका को सीधे धमकाने का प्रयास किया गया था।







