Supreme Court in view
Judges Vacancy: सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि देशभर में जिला न्यायपालिका के करीब 25,870 स्वीकृत पदों में से लगभग 5,000 पद अब भी खाली हैं।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्ष में चल रही सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाोच जजों की संविधान पीठ इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही है कि क्या वे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने बेंच पर आने से पहले सात साल तक वकालत की है, बार कोटे से जिला न्यायाधीश नियुक्ति के पात्र माने जा सकते हैं। पीठ में न्यायमूर्ति एम. एम. सुन्दरश, अरविंद कुमार, एस. सी. शर्मा और के. विनोद चंद्रन भी शामिल हैं। यह सुनवाई लगातार दूसरे दिन जारी रही।
यह है केस के मुख्य बिंदु
- वरिष्ठ अधिवक्ता मनेका गुरुस्वामी ने कानून मंत्रालय के आंकड़े रखते हुए कहा कि देशभर में 4,789 रिक्तियां हैं। उनका कहना था कि बार में अनुभव और न्यायिक सेवा में अनुभव को समान माना जाना चाहिए, क्योंकि यह एक ही धारा की दो धाराएँ हैं जो अंततः न्यायपालिका के सागर में मिलती हैं।
- संविधान पीठ अनुच्छेद 233 की व्याख्या कर रही है, जो जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति केंद्र या राज्य की सेवा में नहीं है और कम से कम सात साल तक वकील रहा है, वही जिला न्यायाधीश बनने का पात्र होगा, यदि हाईकोर्ट उसकी सिफारिश करे।
- सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या अनुच्छेद 233 सिर्फ घोषणात्मक है या यह खुद नियुक्ति का स्रोत भी है।
- जस्टिस सुन्दरश ने कहा कि 233(1) नियुक्ति और प्रमोशन से संबंधित है, जबकि 233(2) वकीलों की पात्रता तय करता है।
- जस्टिस शर्मा ने पूर्ववर्ती फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चिंता यह रहती है कि सेवा में रह रहे न्यायिक अधिकारी वकीलों पर अनुचित बढ़त न पा लें।
- वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के लिए बार और बेंच के अनुभव को समान माना जाता है, इसलिए जिला न्यायाधीश नियुक्ति में भी इसे जोड़ा जाना चाहिए।






