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Justice Abhay S Oka: सुप्रीम कोर्ट सिर्फ चीफ जस्टिस केंद्रित नहीं रहना चाहिए: जस्टिस ओका

Justice Abhay S Oka: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा, सुप्रीम कोर्ट एक चीफ जस्टिस केंद्रित कोर्ट बन गया है, जबकि इसमें देशभर से आए 34 जज शामिल हैं।

विदाई समारोह का आयोजन

जस्टिस ओका ने कहा कि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से काम करते हैं, क्योंकि वहां पहले पांच जजों की एक एडमिनिस्ट्रेटिव कमेटी होती है, जो अहम फैसले लेती है। उन्होंने कहा, “पिछले कुछ सालों में मैंने देखा है कि सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस केंद्रित कोर्ट बन गया है। मुझे लगता है कि इसे बदलने की जरूरत है। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के विदाई समारोह में उन्होंने कहा कि अब इस छवि को बदलने की जरूरत है।

जिला अदालतों की अनदेखी की गई

जस्टिस ओका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने ट्रायल और जिला अदालतों की अनदेखी की है, जबकि यही न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने बताया कि ट्रायल कोर्ट में कई मामले 30 साल से लंबित हैं।

मैनुअल लिस्टिंग कम होनी चाहिए

मामलों की लिस्टिंग को लेकर उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ केस अगले ही दिन लग जाते हैं, जबकि कुछ केस कई दिनों तक लंबित रहते हैं। उन्होंने कहा, “जब तक मैनुअल हस्तक्षेप कम नहीं होगा, तब तक लिस्टिंग में सुधार नहीं हो सकता। हमारे पास एआई और अन्य सॉफ्टवेयर हैं, जो केसों की लिस्टिंग को तर्कसंगत बना सकते हैं।”

कभी असहमति वाला फैसला नहीं दिया

जस्टिस ओका ने बताया कि अपने दो दशक से ज्यादा के करियर में उन्होंने कभी असहमति वाला फैसला नहीं दिया। उन्होंने कहा, “मेरे कार्यकाल में मैंने कभी डिसेंटिंग जजमेंट नहीं दिया। मेरे साथियों ने भी नहीं दिया। सिर्फ दो दिन पहले एक अपवाद हुआ।”

रिटायरमेंट के बाद मीडिया से बात नहीं करेंगे

उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट के तुरंत बाद वे मीडिया से बात नहीं करेंगे। “मैंने तय किया है कि पद पर रहते हुए मीडिया से बात नहीं करूंगा। अब भी मुझे 2-3 महीने का कूलिंग पीरियड चाहिए। अभी मन में भावनाएं हैं, ऐसे में कुछ ऐसा कह सकता हूं जो नहीं कहना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट को आत्ममंथन की जरूरत

बार को दिए एक संदेश में जस्टिस ओका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी को अपनी स्थापना के 75 साल पूरे किए हैं। इस मौके पर जश्न मनाने की बजाय आत्ममंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा, “देश के नागरिकों को इस कोर्ट से बहुत उम्मीदें थीं। हालांकि कोर्ट का योगदान कोई नकार नहीं सकता, लेकिन मेरी निजी राय है कि सुप्रीम कोर्ट नागरिकों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरा।”

80 हजार केस लंबित, मिलकर काम करने की जरूरत

उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में 80 हजार से ज्यादा केस लंबित हैं। “हमारे पास 34 जजों की स्वीकृत संख्या है, लेकिन इसके बावजूद हम पेंडेंसी को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं। बार और बेंच को मिलकर काम करना होगा, तभी लंबित मामलों को कम किया जा सकेगा।”

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