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Justice Delayed then Delivered: न्याय की तराजू पर गवाहों की गिनती नहीं, उनकी क्वालिटी देखें…किस केस में यह कहा गया, देखें

Justice Delayed then Delivered: झारखंड हाई कोर्ट का यह हालिया फैसला आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) के एक बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करता है: “साक्ष्यों को गिना नहीं, बल्कि तौला जाना चाहिए।

हाईकोर्ट जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की बेंच ने 1998 में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा है। 31 साल पुराने इस हत्या के मामले में कोर्ट ने दो आरोपियों को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि गवाहों की संख्या से ज्यादा उनकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता मायने रखती है।

कोर्ट का ‘गोल्डन रूल’: “Quality over Quantity”

  • हाई कोर्ट ने 12 मार्च के अपने आदेश में एक कालजयी सिद्धांत (Time-honoured principle) दोहराया।
  • तुलना: साक्ष्य (Evidence) की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी सामग्री (Material) महत्वपूर्ण है।
  • एकल गवाह: कानून में एक अकेले चश्मदीद गवाह (Sole Eyewitness) के आधार पर सजा देने में कोई बाधा नहीं है, लेकिन शर्त यह है कि उसकी गवाही पूरी तरह भरोसेमंद हो और कोर्ट के मन में विश्वास पैदा करे।

मामला क्या था? (The 1995 Murder)

  • घटना: फरवरी 1995 में चतरा जिले में 65 वर्षीय संतु मेहरा की हत्या कर दी गई थी।
  • आरोप: आरोपियों ने संतु मेहरा के बेटे किस्टो मेहरा को ढूंढने के लिए घर पर धावा बोला। जब बेटा नहीं मिला, तो उन्होंने बुजुर्ग पिता को घसीटकर बाहर निकाला और बेरहमी से उनकी हत्या कर दी।
  • मकसद: अभियोजन पक्ष का दावा था कि दोनों परिवारों के बीच पुरानी रंजिश और मुकदमेबाजी चल रही थी, जिसके कारण इस वारदात को अंजाम दिया गया।

कोर्ट ने सजा क्यों पलटी? (Key Legal Findings)

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत के 1998 के फैसले में कई खामियां पाईं।
  • संदेहास्पद गवाही: पूरी सजा केवल बहू (Daya Devi) की गवाही पर टिकी थी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि दोनों पक्षों में दुश्मनी थी, इसलिए बहू की साख (Credentials) पर संदेह था।
  • अंधेरा और पहचान: बहू ने दावा किया कि उसने ‘मिट्टी के दीये’ (Earthen lamp) की रोशनी में हमलावर को देखा। लेकिन पुलिस ने न तो उस दीये को जब्त किया और न ही उसे कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया।
  • Benefit of Doubt: कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी के दोष को लेकर उचित संदेह (Reasonable Doubt) हो, तो इसका लाभ विशेष रूप से आरोपी को मिलना चाहिए।
  • बचाव पक्ष के गवाह: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बचाव पक्ष के गवाहों (Defense Witnesses) को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना अभियोजन पक्ष के गवाहों को दिया जाता है।

कोर्ट का आदेश और निर्देश

  • बरी (Acquittal): नुनदेव मेहरा और अन्य आरोपियों को सभी आपराधिक दायित्वों से मुक्त कर दिया गया है।
  • एमीकस क्यूरी (Amicus Curiae): कोर्ट ने इस मामले में मदद करने वाले वकील परंबीर सिंह बजाज की सराहना की और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को उन्हें मानदेय देने का निर्देश दिया।

निष्कर्ष: न्याय की तराजू

यह फैसला याद दिलाता है कि केवल “गवाहों की फौज” खड़ी कर देने से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्याय की तराजू पर गवाही का वजन उसके सच और विश्वसनीयता से मापा जाता है, उसकी संख्या से नहीं।

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