Friday, August 14, 2026
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Global Legal Battle-Chapter 1 : प्रतिष्ठा की हत्या…श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट जज बनाम गूगल, बड़ी तीखी बहस है जारी, अगले पार्ट में जानिए क्या हुआ

Global Legal Battle-Chapter 1 : कर्नाटक हाई कोर्ट में चल रहा यह मामला एक हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई है।

यह इंटरनेट क्षेत्राधिकार (Internet Jurisdiction) और मध्यवर्ती उत्तरदायित्व (Intermediary Liability) के वैश्विक सवाल भी खड़े करता है। कर्नाटक हाई कोर्ट में श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस नवाज की उस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ ऑनलाइन मौजूद ‘अपमानजनक’ सामग्री को हटाने की मांग की है। गूगल ने इस याचिका को साहसिक (Adventurous) बताते हुए इसे खारिज करने की मांग की।

गूगल की मुख्य आपत्ति: “हम सही पक्षकार नहीं हैं

  • गूगल इंडिया के वकील मनु पी. कुलकर्णी ने कोर्ट में तर्क दिया।
  • क्षेत्राधिकार (Jurisdiction): याचिकाकर्ता श्रीलंका के जज हैं और सामग्री भी श्रीलंका से संबंधित है, इसलिए कर्नाटक हाई कोर्ट में यह मामला नहीं बनता।
  • Google LLC बनाम Google India: गूगल ने कहा कि सर्च इंजन का संचालन अमेरिका स्थित ‘Google LLC’ करता है, न कि ‘Google India’। इसलिए जज को अपनी याचिका में सुधार कर अमेरिकी कंपनी को प्रतिवादी (Respondent) बनाना चाहिए।

जज का पक्ष: “अपनी ही अदालत में केस नहीं लड़ सकता”

  • जस्टिस नवाज के वकील प्रभाकरन रामचंद्रन ने भावुक और कानूनी दलीलें पेश कीं।
  • नैतिक मजबूरी: चूंकि वे श्रीलंका में सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, इसलिए वे वहां मुकदमा नहीं कर सकते। कानून का सिद्धांत है कि “कोई भी अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता।”
  • बेंगलुरु क्यों?: चूंकि गूगल का भारतीय मुख्यालय बेंगलुरु में है, इसलिए उन्होंने यहाँ का रुख किया।
  • प्रतिष्ठा की हत्या: याचिका में कहा गया कि 2015 और 2020 में प्रकाशित लेख उनके चरित्र का ‘कत्ल’ करने और एक वैश्विक न्यायविद् के रूप में उनकी गरिमा को खत्म करने की साजिश हैं।

कोर्ट में तीखी बहस: “प्रेस बनाम न्यायपालिका”

  • जज के वकील ने गूगल की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए।
  • दोहरा मापदंड: “अगर सुंदर पिचाई या गूगल के खिलाफ कुछ गलत लिखा जाए, तो क्या कंपनी उसे रहने देगी? जजों को डराने के लिए ऐसी सामग्री का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।”
  • गूगल की जिम्मेदारी: “जैसे ही गूगल के संज्ञान में ऐसी अपमानजनक सामग्री आती है, उसे हटाना उनकी जिम्मेदारी है।”

कोर्ट का वर्तमान आदेश

  • जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने इस मामले में प्रारंभिक निर्देश दिए हैं।
  • याचिका में संशोधन: जज को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी याचिका में सुधार करें (संभवतः गूगल एलएलसी को शामिल करने के लिए)।
  • अगली सुनवाई: केंद्र सरकार और गूगल को संक्षिप्त जवाब दाखिल करने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 26 मार्च (यानी कल) के लिए तय की गई थी।

निष्कर्ष: इंटरनेट के दौर में न्याय की चुनौती

यह मामला दिखाता है कि डिजिटल युग में ‘मानहानि’ की कोई सीमा नहीं होती। एक देश का जज दूसरे देश की अदालत में एक तीसरे देश (अमेरिका) की कंपनी के खिलाफ लड़ रहा है। यह फैसला तय करेगा कि क्या टेक दिग्गज कंपनियों को किसी भी देश की अदालत में उनके ‘स्थानीय कार्यालय’ के आधार पर जवाबदेह ठहराया जा सकता है या नहीं।

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