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Justice for Gulati: 24 साल बाद मिला न्याय…दिल्ली HC ने वकील और पुलिस अधिकारी को फंसाने का दोषी माना

Justice for Gulati: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक वकील और एक सब-इंस्पेक्टर की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखते हुए न्यायपालिका और पुलिस व्यवस्था के भीतर ‘शक्तियों के दुरुपयोग’ पर कड़ी टिप्पणी की है।

हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने वकील हाजी अल्ताफ और सब-इंस्पेक्टर नरेंद्र सिंह की अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पीड़ित सुशील गुलाटी के कानूनी वारिसों के लिए मुआवजे को 2 लाख से बढ़ाकर 3 लाख रुपये कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि निर्दोष व्यक्ति को झूठे रेप केस में फंसाने के लिए पुलिस और वकील की मिलीभगत “अक्षम्य” है।

साजिश की पूरी कहानी (The Conspiracy of 2000)

  • बदले की भावना: साल 2000 में सुशील गुलाटी ने एक महिला को एक चौकी प्रभारी (चंद्रमोहन दत्ता) द्वारा यौन उत्पीड़न से बचाया था। इसके बाद दत्ता ने गुलाटी को सबक सिखाने की साजिश रची।
  • झूठा केस: दत्ता ने वकील अल्ताफ और सब-इंस्पेक्टर सिंह के साथ मिलकर एक महिला को पैसे दिए और गुलाटी पर ‘चलती कार में सामूहिक बलात्कार’ का झूठा आरोप लगवाया।
  • खुलासा: जब मामला क्राइम ब्रांच को सौंपा गया, तो गहन पूछताछ में यह पूरी साजिश बेनकाब हो गई।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “वकील और पुलिस का दोहरा चेहरा”

  • अदालत ने दोनों पेशेवरों की भूमिका पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया।
  • वकील का कर्तव्य: “एक वकील अदालत का अधिकारी होता है, जिसका काम मुवक्किल का बचाव करना और कोर्ट की सहायता करना है, न कि निर्दोषों को अपराध में फंसाना।”
  • पुलिस की भूमिका: “पुलिस अधिकारी का कर्तव्य अपराध रोकना है, लेकिन यहाँ उसने पद का घोर अपमान करते हुए अपराध को अंजाम दिया।”
  • कड़ा संदेश: कोर्ट ने कहा कि इन पदों पर बैठे लोगों को और भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी ताकि समाज में एक सख्त संदेश जाए।

पीड़ित का ‘मैक्सिमम’ उत्पीड़न (Harassment to the Limit)

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत (Trial Court) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।
  • कस्टोडियल हिंसा: गुलाटी को न केवल झूठे केस में फंसाया गया, बल्कि पुलिस हिरासत में उन्हें बेरहमी से पीटा और प्रताड़ित किया गया।
  • अदालती देरी: गुलाटी को लगभग 20 बार कोर्ट बुलाया गया, लेकिन बिना गवाही लिए वापस भेज दिया गया। 2014 में अपनी गवाही पूरी होने के तीन साल बाद उनका निधन हो गया।
  • सतर्कता की कमी: कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को बचाव पक्ष की मांग पर बार-बार स्थगन (Adjournment) नहीं देना चाहिए था।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

पक्षविवरण
दोषीहाजी अल्ताफ (वकील) और नरेंद्र सिंह (सब-इस्पेक्टर)।
सजा2016 में दी गई 4 साल की सजा बरकरार (क्योंकि राज्य सरकार ने सजा बढ़ाने की अपील नहीं की थी)।
मुआवजा₹2 लाख से बढ़ाकर ₹3 लाख किया गया।
गवाहकोर्ट ने माना कि गरीब तबके के गवाहों को भारी रकम देकर साजिश का हिस्सा बनाया गया था।

निष्कर्ष: सिस्टम की विफलता और सुधार

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं, तो न्याय का रास्ता बहुत लंबा और कठिन हो जाता है। सुशील गुलाटी आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन कोर्ट ने उनकी गरिमा को बहाल करते हुए यह साफ कर दिया कि सत्ता और पद का दुरुपयोग करने वालों को कानून कभी माफ नहीं करेगा।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM: HON’BLE MS. JUSTICE CHANDRASEKHARAN SUDHA
CRL.A. 286/2016
HAJI MOHD. ALTAF
Versus THE STATE .

CRL.A. 326/2016
NARENDER SINGH
versus THE STATE NCT OF DELHI .

CRL.A. 691/2016
SUSHIL GULATI (VICTIM SINCE DECEASED)THR. LEGAL
REPRESENTATIVES ASHA GULATI …..Appellant
CRL.A. 286/2016 & connected matters
versus
STATE & ORS

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