Lawyers & Limitation: दिल्ली हाई कोर्ट ने कानूनी देरी (Delay Condonation) को लेकर एक कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने धारा 482 (CrPC) के तहत दायर एक याचिका को सुनने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता, जो स्वयं एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं, ने निचली अदालत के एक आदेश को चुनौती देने में 412 दिनों की देरी की थी। अदालत ने फैसला सुनाया है कि एक पेशेवर वकील का यह तर्क कि उसे अदालती आदेश को “समझने” और “कानूनी रिसर्च” करने में एक साल से ज्यादा का समय लग गया, देरी को माफ करने का वैध आधार नहीं हो सकता।
वकील की दलील और कोर्ट की फटकार
- याचिकाकर्ता का तर्क: उन्होंने अदालत से कहा कि विवादित आदेश (Impugned Order) को पूरी तरह समझने और उस पर कानूनी शोध (Legal Research) करने में उन्हें काफी समय लग गया, इसलिए देरी हुई।
- कोर्ट का रुख: “यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई व्याख्या संतोषजनक नहीं है। एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट का यह कहना कि उसे आदेश समझने में एक साल लगा, अपने आप में देरी माफी का आधार नहीं हो सकता।”
कानूनी सीमा (Law of Limitation) का महत्व
- अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अगर ऐसे कारणों को स्वीकार किया गया, तो न्याय व्यवस्था चरमरा जाएगी।
- नियमों का उल्लंघन: “अगर इस तरह के आधार को ‘पर्याप्त स्पष्टीकरण’ (Sufficient Cause) मान लिया गया, तो ‘मर्यादा कानून’ (Law of Limitation) और ‘विलंब के सिद्धांत’ (Principles of Laches) पूरी तरह अर्थहीन हो जाएंगे।”
- समानता का सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि हर वकील या वादी फिर यही बहाना बनाएगा कि वह न्यायिक आदेश को समझ नहीं पाया और शोध में व्यस्त रहा।
दिन-प्रतिदिन का हिसाब जरूरी (The Explanation Test)
- हाई कोर्ट ने देरी माफी के आवेदन के लिए पुराने स्थापित नियमों को दोहराया।
- स्पष्ट व्याख्या: देरी माफी चाहने वाले पक्ष को अदालत के सामने एक ठोस और संतोषजनक स्पष्टीकरण रखना चाहिए, जिसमें देरी की पूरी अवधि (अधिमानतः दिन-प्रतिदिन या चरण-दर-चरण) का हिसाब हो।
- चुप्पी पर सवाल: कोर्ट ने पाया कि इस मामले में याचिकाकर्ता का आवेदन एक साल की लंबी अवधि के दौरान उठाए गए कदमों के बारे में पूरी तरह चुप था। इसमें किसी विशिष्ट तारीख, घटना या परिस्थिति का खुलासा नहीं किया गया था।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विषय | अदालत का निष्कर्ष |
| देरी की अवधि | 412 दिन (लगभग 14 महीने)। |
| याचिकाकर्ता की पहचान | स्वयं एक पेशेवर वकील (Practising Advocate)। |
| धारा 482 (CrPC) | हालांकि इसके लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं है, लेकिन इसे ‘उचित समय’ के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए। |
| नतीजा | देरी माफी का आवेदन और मुख्य याचिका, दोनों खारिज। |
निष्कर्ष: कानूनी तत्परता (Due Diligence) अनिवार्य
यह फैसला यह याद दिलाता है कि कानून केवल उनकी मदद करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क और तत्पर हैं (Vigilantibus non dormientibus jura subveniunt)। एक वकील से यह अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायिक आदेशों को समझने में सामान्य नागरिक से अधिक तेज हो। रिसर्च के नाम पर एक साल से अधिक का समय लेना ‘उचित तत्परता’ की श्रेणी में नहीं आता।
IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM: HON’BLE DR. JUSTICE SWARANA KANTA SHARMA
CRL.M.C. 1913/2024
AJIT KUMAR GOLA
versus
STATE (GNCTD) AND ANR.

