Legal Education: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) की बदलती शिक्षा पद्धति और छात्रों की बढ़ती ‘कॉरपोरेट’ मानसिकता पर गहरी चिंता जताई है।
जस्टिस संजय करोल ने कहा कि आज की कानूनी शिक्षा छात्रों को केवल ऊंची सैलरी वाली कॉरपोरेट नौकरियों के लिए तैयार कर रही है, जो देश की वास्तविक न्यायिक जरूरतों से कोसों दूर है। भोपाल के NLIU में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कानून के छात्रों को ‘चमक-धमक’ वाली कॉरपोरेट दुनिया से निकलकर जमीनी हकीकत और हाशिए पर खड़े लोगों की सेवा करने की सलाह दी।
‘Suits’ बनाम ‘मामला लीगल है’ (Realty Check)
- जस्टिस करोल ने ओटीटी (OTT) सीरीज का उदाहरण देते हुए एक बड़ा अंतर स्पष्ट किया।
- ग्लैमर का भ्रम: उन्होंने कहा कि छात्र नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘Suits’ से प्रभावित होकर कॉरपोरेट वकील बनने का सपना देख रहे हैं।
- जमीनी हकीकत: भारत की असली न्याय प्रणाली ‘मामला लीगल है’ और ‘पंचायत’ जैसी सीरीज में दिखाई गई सच्चाई के करीब है, जहाँ सिस्टम देरी और उलझनों से भरा है।
- पाठ्यपुस्तकों की कमी: उन्होंने कहा कि कोई भी किताब छात्रों को उस ‘कन्फ्यूज्ड’ और ‘देरी’ वाले सिस्टम के लिए तैयार नहीं करती, जो भारत के ग्रामीण इलाकों में मौजूद है।
संविधान को ‘पवित्र ग्रंथ’ की तरह जिएं
- जस्टिस करोल ने छात्रों से अपील की कि वे संविधान को केवल एक दस्तावेज न समझें।
- रोजमर्रा का हिस्सा: संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार), भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) और भाग IV-A (मौलिक कर्तव्य) को हर छात्र को अपने दैनिक जीवन में उतारना चाहिए।
- पवित्र ग्रंथ: उन्होंने कहा, “चाहे आप मार्केट में हों, हॉस्टल में हों या घर पर—संविधान के इन हिस्सों को हर दिन एक पवित्र ग्रंथ की तरह पढ़ा और जिया जाना चाहिए।”
कॉरपोरेट कॉरिडोर से परे देखें
- न्यायाधीश ने वकीलों के मूल कर्तव्य की याद दिलाई।
- 140 करोड़ भारतीयों की सेवा: वकील का काम केवल ध्यान खींचना या वाहवाही लूटना नहीं है, बल्कि देश के हर नागरिक का जीवन बदलना है, चाहे उनकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो।
- ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति: उन्होंने युवा वकीलों को चेतावनी दी कि केवल स्किल दिखाकर ‘वैलिडेशन’ (Validation) मांगना वकालत का उद्देश्य नहीं है।
मेरे चैंबर के दरवाजे छात्रों के लिए खुले हैं
- छात्रों को प्रोत्साहित करते हुए जस्टिस करोल ने एक बड़ी घोषणा की।
- इंटर्नशिप का मौका: पिछले 3 वर्षों में उनके सुप्रीम कोर्ट चैंबर में 250 से अधिक छात्र इंटर्नशिप कर चुके हैं।
- सीखने का अवसर: उन्होंने NLIU के छात्रों से कहा कि वे ‘जुडिशियल इंटर्नशिप’ (Judicial Internship) के अवसरों का लाभ उठाएं और अपने पंख फैलाएं।
- छात्रों से प्रेरणा: जस्टिस करोल ने स्वीकार किया कि युवा छात्रों की आधुनिक सोच और ऊर्जा ने उनके खुद के न्यायिक दर्शन (Judicial Philosophy) को आकार देने में मदद की है।
सामाजिक न्याय की ओर वापसी
जस्टिस संजय करोल का यह भाषण कानून की पढ़ाई कर रहे युवाओं के लिए एक वेक-अप कॉल (Wake-up call) है। उन्होंने याद दिलाया कि कानून का पेशा पैसा कमाने की मशीन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने का एक मिशन है।

