Sunday, August 30, 2026
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Tribal Marriage Row: दूसरी पत्नी को उत्तराधिकार देने से किया इनकार…कहा- साबित करनी होगी बहुविवाह की परंपरा, पूरा मामला पढ़ें

Tribal Marriage Row: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आदिवासी समुदायों में उत्तराधिकार और विवाह के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है।

हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने एक कोयला खदान कर्मी की कथित ‘दूसरी पत्नी’ की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मौखिक रूप से यह कह देना कि “हमारे समाज में दो शादियां मान्य हैं” पर्याप्त नहीं है, इसके लिए ऐतिहासिक और सामाजिक साक्ष्य जरूरी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल अनुसूचित जनजाति (ST) का हिस्सा होने मात्र से कोई व्यक्ति हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के नियमों से स्वतः मुक्त नहीं हो जाता, जब तक कि वह अपनी विशिष्ट ‘परंपरा’ या ‘रूढ़ि’ (Custom) को ठोस सबूतों के साथ साबित न कर दे।

मामला क्या था? (The Dispute of Two Wives)

  • पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता (मुन्नी बाई) ने दावा किया कि उसने 1986 में मृतक से शादी की थी और 2013 में उसकी मृत्यु तक साथ रही। उसने मृतक के रिटायरमेंट फंड और अन्य लाभों में हिस्सेदारी मांगी।
  • विवाद: मृतक की पहली पत्नी (प्रतिवादी नं. 1) ने इसका विरोध किया। उसने तर्क दिया कि वह अकेली कानूनी पत्नी है और दूसरी शादी को कानूनन मान्यता नहीं दी जा सकती।
  • दलील: मुन्नी बाई ने तर्क दिया कि चूंकि वे आदिवासी (ST) हैं, इसलिए उन पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता और उनके रीति-रिवाजों में बहुविवाह (Polygamy) की अनुमति है।

कोर्ट का तर्क: “प्रथा को सिद्ध करना अनिवार्य”

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए कुछ कड़े कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए।
  • स्वतः छूट नहीं: कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने का मतलब यह नहीं है कि आप सामान्य विवाह कानूनों से बाहर हैं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के तहत छूट पाने के लिए यह साबित करना होगा कि वह समुदाय अभी भी अपनी पुरानी और अलग परंपराओं का पालन कर रहा है।
  • सबूत का अभाव: याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई साहित्य (Literature), न्यायिक मिसाल (Precedent) या ठोस गवाह पेश नहीं कर सकी कि उसके कबीले में बहुविवाह एक स्थापित परंपरा है।
  • सुप्रीम कोर्ट का हवाला: कोर्ट ने लाबिश्वर मांझी बनाम प्राण मांझी मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक परंपराएं सामान्य कानून से काफी अलग और निरंतर चलन में न हों, तब तक छूट का दावा नहीं किया जा सकता।

फैसले के 3 मुख्य बिंदु (Key Legal Takeaways)

  • परंपरा बनाम कानून: आदिवासी रीति-रिवाजों को मिलने वाली सुरक्षा का उपयोग ‘बिना सबूत’ के बहुविवाह को जायज ठहराने के लाइसेंस के रूप में नहीं किया जा सकता।
  • समानांतर अधिकार: यदि पहली शादी वैध रूप से मौजूद है, तो दूसरी शादी को तब तक कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी जब तक कि उसे ‘स्थापित रूढ़ि’ का समर्थन न हो।
  • मौखिक दावा शून्य: केवल मौखिक रूप से परंपरा का दावा करना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।

निष्कर्ष: पहली पत्नी का हक बरकरार

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मुन्नी बाई की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब मृतक कोयला कर्मी के सभी लाभों पर केवल उसकी पहली पत्नी का ही कानूनी अधिकार होगा।

निष्कर्ष: जनजातीय अधिकारों और आधुनिक कानून का संतुलन

यह फैसला उन मामलों में एक ‘नजीर’ बनेगा जहाँ व्यक्तिगत दावों के लिए जनजातीय पहचान का सहारा लिया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘Custom’ (परंपरा) को कानून की तरह ही साबित करना पड़ता है, अन्यथा सामान्य विवाह कानून ही सर्वोपरि रहेंगे।

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