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Maintenance Default: 66 महीने तक नहीं दिया गुजारा भत्ता…अब पति को काटना होगा 660 दिन का जेल, आदेश में जान लें सजा का गणित

Maintenance Default: गुजरात हाई कोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) के मामले में एक कड़ा फैसला सुनाते हुए पति की 660 दिनों की जेल की सजा को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के जस्टिस हसमुख डी. सुथार की बेंच ने अहमदाबाद फैमिली कोर्ट के 2014 के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें एक व्यक्ति को ₹3.97 लाख का बकाया न चुकाने पर जेल भेजा गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करना पति का सामाजिक और कानूनी कर्तव्य है, जिससे वह अपनी संपत्ति न होने का बहाना बनाकर बच नहीं सकता।

सजा का गणित: 1 महीना डिफॉल्ट = 10 दिन जेल

  • कोर्ट ने सजा की अवधि को जायज ठहराते हुए गणना स्पष्ट की।
  • बकाया अवधि: पति ने कुल 66 महीनों तक अपनी पत्नी और दो बच्चों को गुजारा भत्ता नहीं दिया था।
  • सजा की दर: फैमिली कोर्ट ने प्रति माह डिफॉल्ट के लिए 10 दिन की साधारण कैद की सजा सुनाई थी।
  • कुल सजा: 66 महीने × 10 दिन = 660 दिन की जेल।
  • अदालत की टिप्पणी: हाई कोर्ट ने माना कि यह सजा “अनुचित या असंगत” (Disproportionate) नहीं है।

असमर्थता का बहाना नहीं चलेगा

  • सुनवाई के दौरान पति ने तर्क दिया था कि उसके पास कोई संपत्ति नहीं है और वह भुगतान करने में “असमर्थ और अनिच्छुक” है।
  • पवित्र कर्तव्य: कोर्ट ने कहा, अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करना पति का प्राथमिक कर्तव्य है।
  • जीवन स्तर: पत्नी और बच्चे उसी जीवन स्तर के हकदार हैं, जिसका आनंद वे पति के साथ रहते हुए ले रहे थे।
  • जिम्मेदारी से भागना: पति अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि वह गरीब है या कमा नहीं रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि (Background)

  • शादी और अलगाव: कपल की शादी 2002 में हुई थी। 2007 में विवाद के कारण पत्नी ने घर छोड़ दिया और Section 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग की।
  • कोर्ट का आदेश: 2013 में फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी के लिए ₹2,500 और बच्चों के लिए ₹2,000 व ₹1,500 प्रति माह देने का आदेश दिया।
  • उल्लंघन: पति ने इस आदेश का पालन नहीं किया, जिससे बकाया राशि बढ़कर ₹3.97 लाख हो गई।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयगुजरात हाई कोर्ट का निष्कर्ष
मुख्य प्रावधानSection 125(3) CrPC के तहत भरण-पोषण न देने पर जेल का प्रावधान है।
स्वैच्छिक स्वीकारोक्तिपति ने खुद स्वीकार किया था कि उसने पैसे नहीं दिए और वह देने में असमर्थ है।
पुनरीक्षण (Revision)कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अनियमितता नहीं है, इसलिए हस्तक्षेप की जरूरत नहीं।
सामाजिक संदेशभरण-पोषण का उद्देश्य आश्रितों की गरिमा और वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

निष्कर्ष: कानून का कड़ा संदेश

यह फैसला उन लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो कोर्ट के आदेश के बावजूद अपने परिवार को आर्थिक सहायता देने में आनाकानी करते हैं। गुजरात हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘गरीबी’ या ‘संपत्ति न होना’ गुजारा भत्ता न देने का कानूनी बचाव नहीं हो सकता। यदि आप भुगतान नहीं करते हैं, तो जेल की सजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

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