Men’s dignity: केरल हाई कोर्ट के जस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने एक विवाहित महिला और उसके प्रेमी की याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम आदेश दिया।
केरल हाई कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और जटिल मामले की सुनवाई करते हुए पुरुष की गरिमा, स्वाभिमान और सामाजिक पहचान को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने एक बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) में पिता का नाम बदलने की अनुमति देते हुए कहा कि “पुरुषों का भी अपना सम्मान और आत्म-सम्मान होता है। दरअसल, यह मामला एक ऐसी बच्ची से जुड़ा था जिसका जन्म महिला के विवाहेतर संबंध (Extra-marital relationship) से हुआ था, लेकिन रिकॉर्ड में पिता के रूप में उसके कानूनी पति का नाम दर्ज था।
मामले की पृष्ठभूमि
- विवाह और संबंध: याचिकाकर्ता महिला की शादी 2006 में हुई थी। शादी के दौरान ही उसका दूसरे पुरुष से संबंध बना और 2017 में एक बच्ची का जन्म हुआ।
- गलत प्रविष्टि: उस समय महिला के पति को लगा कि बच्चा उसका है, इसलिए अस्पताल के रिकॉर्ड में उसका नाम पिता के रूप में दर्ज हो गया।
- तलाक और पुनर्विवाह: 2023 में पति-पत्नी का आपसी सहमति से तलाक हो गया। इसके बाद महिला ने अपने प्रेमी (बच्ची के जैविक पिता) से शादी कर ली।
- विवाद: स्कूल की औपचारिकताओं के लिए जब जन्म प्रमाण पत्र में जैविक पिता का नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई, तो रजिस्ट्रार ने इसे बदलने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास पितृत्व (Paternity) तय करने का अधिकार नहीं था।
हाई कोर्ट की सख्त और भावुक टिप्पणियां
- अदालत ने पूर्व पति की स्थिति को “एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति की दुखद कहानी” बताया।
- सामाजिक पहचान: “पुरुषों का भी गौरव, स्वाभिमान और एक सामाजिक पहचान होती है। हमारी जैसी संस्कृति में, जहाँ वैवाहिक निष्ठा (Marital Fidelity) को बहुत महत्व दिया जाता है, एक पति सार्वजनिक रूप से खुद को उपहास का पात्र महसूस कर सकता है यदि किसी और के बच्चे के लिए उसका नाम पिता के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
- जेंटलमैन’ व्यवहार: कोर्ट ने महिला के पूर्व पति की प्रशंसा की कि सत्य जानने के बाद भी उसने बच्चे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई आपत्ति नहीं जताई। कोर्ट ने इसे उसका “जेंटलमैन एटीट्यूड” कहा।
अदालत का फैसला और निर्देश
- तकनीकी रूप से बिना DNA टेस्ट के रजिस्ट्रार नाम नहीं बदल सकता था, लेकिन कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए कई आदेश दिए।
- नाम में सुधार: कोर्ट ने त्रिशूर नगर निगम को आदेश दिया कि वे मूल प्रविष्टि को बदले बिना ‘मार्जिनल एंट्री’ (Marginal Entry) के जरिए पिता का नाम सही करें और 30 दिनों के भीतर नया प्रमाण पत्र जारी करें।
- बच्चे का भविष्य: कोर्ट ने कहा कि वह बच्ची के भविष्य को अंधकार में नहीं देख सकता। वह बालिग हो, उससे पहले उसके रिकॉर्ड सही होने चाहिए।
- गोपनीयता: कोर्ट ने निर्देश दिया कि फैसले की कॉपी अपलोड करते समय बच्ची और पूर्व पति के नाम को छिपाया (Masking) जाए।
कानूनी प्रक्रिया (एक नजर में)
प्रावधान नियम
अधिनियम जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 (धारा 15)
कोर्ट की शक्ति अनुच्छेद 226 (असाधारण क्षेत्राधिकार)
सुधार का तरीका मार्जिनल एंट्री (Marginal Entry) के माध्यम से
निष्कर्ष
यह फैसला कानूनी पेचीदगियों से ऊपर उठकर मानवीय संवेदनाओं और पुरुष के सामाजिक सम्मान को प्राथमिकता देता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल प्रक्रिया का पालन करना नहीं है, बल्कि अन्याय को दूर करना भी है।
पहचान संबंधित कानूनी विवाद हाे ताे यह करें
जब किसी व्यक्ति को अपनी सुरक्षा (Personal Safety) या पहचान (Identity) से संबंधित कानूनी विवाद के लिए मदद चाहिए हो, तो उसे कदम उठाने चाहिए।:
- पहचान (Identity) से जुड़े सुधार के लिए (जैसे नाम, पिता का नाम बदलना)
- यदि जन्म प्रमाण पत्र या अन्य सरकारी दस्तावेजों में सुधार करना है, तो प्रक्रिया है।
- संबंधित विभाग में आवेदन: सबसे पहले उसी विभाग (जैसे नगरपालिका या स्कूल बोर्ड) में आवेदन दें जहाँ से दस्तावेज जारी हुआ है।
- हलफनामा (Affidavit): एक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट या नोटरी के समक्ष शपथ पत्र बनवाएं जिसमें सही जानकारी और बदलाव का कारण लिखा हो।
- गजट नोटिफिकेशन: यदि नाम पूरी तरह बदलना है, तो राज्य या केंद्र के आधिकारिक गजट (Gazette) में विज्ञापन देना सबसे मजबूत कानूनी सबूत माना जाता है।
- अदालत का दरवाजा (Civil Suit): यदि विभाग सुधार से मना कर दे, तो ‘दीवानी न्यायालय’ (Civil Court) में ‘घोषणात्मक वाद’ (Declaratory Suit) दायर किया जा सकता है।
- व्यक्तिगत सुरक्षा (Protection of Life & Liberty) के लिए
- यदि किसी जोड़े या व्यक्ति को जान का खतरा महसूस हो रहा है, तो उन्हें ये कदम उठाने चाहिए।
- स्थानीय पुलिस को लिखित सूचना: सबसे पहले संबंधित थाने के SHO को अपनी सुरक्षा के खतरे के बारे में लिखित शिकायत दें। इसकी एक कॉपी रिसीविंग (पावती) के रूप में अपने पास रखें।
- वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र: यदि थाना मदद न करे, तो जिले के SP या पुलिस कमिश्नर को रजिस्टर्ड डाक के जरिए शिकायत भेजें।
- हाई कोर्ट में याचिका (Writ Petition): जैसा कि आपने पिछले मामलों में देखा, सुरक्षा के लिए सबसे प्रभावी तरीका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में ‘प्रोटेक्शन पिटीशन’ दायर करना है। कोर्ट पुलिस को आदेश देगा कि वह आपकी जान-माल की रक्षा करे।
- कानूनी मदद कहाँ से लें? (Free Legal Aid)
- यदि आपके पास निजी वकील करने के लिए संसाधन नहीं हैं, तो सरकार मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करती है।
- NALSA/SLSA: आप ‘राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण’ (NALSA) या अपने राज्य की विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) के कार्यालय जा सकते हैं।
- हेल्पलाइन नंबर: आप 15100 डायल करके मुफ्त कानूनी सलाह ले सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण सुझाव
किसी भी कानूनी कार्यवाही से पहले, अपने पास सभी संबंधित दस्तावेज (जैसे आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, शादी का प्रमाण या धमकी के सबूत जैसे कॉल रिकॉर्ड/मैसेज) की एक फाइल तैयार रखें।

