Tuesday, September 8, 2026
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Explanation from lawyer: अवमानना के दोषी वकील बिना शुद्धि के पैरवी नहीं कर सकते…इस तरह वकील के जमानत आवेदन को खारिज कर दिया

Explanation from lawyer: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की बेंच ने आवेदक के वकील को लेकर पेश जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।

अदालत ने पाया कि आवेदक के वकील स्वयं आपराधिक अवमानना के दोषी हैं और सुप्रीम कोर्ट से उनकी सजा बरकरार रहने के बावजूद वे नियमों का उल्लंघन कर कोर्ट में पेश हो रहे हैं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में एक वकील के खिलाफ ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show-cause notice) जारी करते हुए एक कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने यह कदम तब उठाया जब पाया गया कि एक वकील, जिसे पहले ही ‘आपराधिक अवमानना’ (Criminal Contempt) का दोषी ठहराया जा चुका था, बिना अपनी सजा या दोष को ‘शुद्ध’ (Purge) किए लगातार कोर्ट में पेश होकर बहस कर रहा था।

यह है मामले की मुख्य बातें

  • नियम 16 का उल्लंघन: ‘मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (प्रैक्टिस की शर्तें) नियम, 2012’ का नियम 16 स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि किसी वकील को आपराधिक अवमानना का दोषी पाया जाता है, तो वह तब तक हाई कोर्ट या किसी भी अधीनस्थ अदालत में पैरवी नहीं कर सकता जब तक कि वह अपनी अवमानना को ‘शुद्ध’ (Purge) न कर ले।
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: वकील को 2018 के एक मामले में दोषी पाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा था, केवल जुर्माने की राशि में कुछ बदलाव किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “जुर्माना कम होने का मतलब दोषमुक्ति नहीं होता।
  • “वकील का आचरण: कोर्ट ने नोट किया कि सुनवाई के दौरान भी वकील का व्यवहार मर्यादित नहीं था। उन्होंने अदालती अनुशासन की अवहेलना की, उत्तेजक टिप्पणियाँ कीं और मामले को मेरिट से भटकाने की कोशिश की।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • संस्थान का अनुशासन: कोर्ट ने कहा कि इस तरह का आचरण न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि “अदालत की गरिमा और सत्ता के प्रति अनादर” भी है।
  • वकील की जिम्मेदारी: कोर्ट ने जोर दिया कि वकालत का मतलब केवल अपने मुवक्किल के लिए बहस करना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखना भी है।

हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए सख्त कदम

  • कारण बताओ नोटिस: कोर्ट ने वकील को नोटिस जारी कर पूछा है कि “किस अधिकार के तहत” वे नियम 16 का पालन किए बिना अदालत में पेश हो रहे हैं।
  • स्टेट बार काउंसिल को निर्देश: कोर्ट ने ‘स्टेट बार काउंसिल’ को भी नोटिस जारी कर पूछा है कि पिछले अवमानना आदेश के बाद उन्होंने उक्त वकील के खिलाफ क्या कार्रवाई की है।
  • जमानत खारिज: जिस मुख्य मामले (BNS के तहत पुलिस पर हमले का आरोप) में वकील पैरवी कर रहे थे, कोर्ट ने उस जमानत अर्जी को भी गंभीर आरोपों के चलते खारिज कर दिया।

अगला कदम

इस मामले को अब 6 अप्रैल, 2026 को शुरू होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। तब तक वकील और बार काउंसिल को अपना जवाब दाखिल करना होगा।

सारांश तालिका: नियम और परिणाम

विषय विवरण
लागू नियम नियम 16, MP हाई कोर्ट (प्रैक्टिस की शर्तें) नियम, 2012
प्रतिबंध अवमानना का दोषी वकील पैरवी नहीं कर सकता जब तक दोष ‘शुद्ध’ (Purge) न हो।
कोर्ट का रुख वकील का आचरण न्यायिक अनुशासन के खिलाफ और संस्थान की गरिमा को कम करने वाला पाया गया।

जानेें अवमानना को शुद्ध करना’ क्या होता है

कानूनी शब्दावली में अवमानना को शुद्ध करना’ (Purging of Contempt) एक सुधारात्मक प्रक्रिया है। इसका सीधा अर्थ है कि अपनी गलती को सुधारना और अदालत की गरिमा को वापस बहाल करना ताकि आप पर लगे प्रतिबंध हटाए जा सकें। जब किसी वकील को अवमानना का दोषी पाया जाता है, तो उसे दोबारा प्रैक्टिस करने की अनुमति तभी मिलती है जब वह अदालत को संतुष्ट कर दे कि उसने अपनी गलती का प्रायश्चित कर लिया है।

अवमानना को ‘शुद्ध’ (Purge) करने के मुख्य तरीके

  • बिना शर्त माफी (Unconditional Apology): यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। वकील को अदालत के सामने लिखित और मौखिक रूप से ऐसी माफी मांगनी होती है जो केवल औपचारिकता न हो, बल्कि उसमें वास्तविक पश्चाताप झलकता हो। यदि कोर्ट को लगता है कि माफी केवल सजा से बचने के लिए मांगी जा रही है, तो वह इसे स्वीकार नहीं करता।
  • सजा या जुर्माने का पालन: यदि कोर्ट ने कोई जुर्माना लगाया है या कोई अन्य दंडात्मक निर्देश दिया है, तो उसका पूर्ण अनुपालन करना ‘शुद्धि’ का हिस्सा है। मध्य प्रदेश वाले मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माना कम किया था, लेकिन वकील ने अन्य शर्तों या माफी की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।
  • विवादास्पद बयान वापस लेना: यदि अवमानना किसी गलत बयान या आरोप के कारण हुई है, तो उस बयान को आधिकारिक तौर पर वापस लेना और उसके लिए खेद प्रकट करना अनिवार्य होता है।
  • भविष्य में अच्छे आचरण का वचन: वकील को यह सुनिश्चित करना होता है कि वह भविष्य में अदालत की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाएगा।

नियम 16 (MP High Court Rules) का प्रभाव

  • मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार, जब तक ‘शुद्धि’ की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक वकील का ‘Right of Audience’ (अदालत में बोलने का अधिकार) निलंबित रहता है।
  • कानूनी सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रवीण चंद्र पांडे बनाम उत्तर प्रदेश’ मामले में स्पष्ट किया था कि किसी वकील को प्रैक्टिस करने से रोकना उसे सजा देना नहीं है, बल्कि अदालत की गरिमा की रक्षा करना है। जब तक वह अपनी गलती नहीं सुधारता, उसे अदालत की कार्यवाही में भाग लेने का नैतिक अधिकार नहीं होता।
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