Private Complaints: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कर्नाटक क्रिमिनल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस, 1968 के नियम 2(1)(b) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है।
एक रिट याचिका पर सुनवाई
यह नियम कुछ मामलों में सेशंस कोर्ट में सीधे निजी शिकायत दाखिल करने की इजाजत देता था। कोर्ट ने कहा कि यह नियम सीआरपीसी के खिलाफ है और इससे दोहरी सजा (डबल जियोपर्डी) और प्रक्रिया में गड़बड़ी का खतरा बढ़ता है। यह फैसला जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित और जस्टिस रामचंद्र डी. हुड्डर की डिवीजन बेंच ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में इस नियम की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी।
सेशंस कोर्ट में सीधे केस दाखिल करना प्रक्रिया का उल्लंघन
कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी के तहत निजी शिकायतों पर आधारित आपराधिक मामलों की सुनवाई मजिस्ट्रेट कोर्ट से शुरू होनी चाहिए, जब तक कि कानून में विशेष रूप से कुछ और न कहा गया हो। लेकिन यह नियम एक समानांतर प्रक्रिया बनाता है, जिससे शिकायतकर्ता सीधे सेशंस कोर्ट में केस दाखिल कर सकते हैं। यह आपराधिक न्याय व्यवस्था की संरचना को बिगाड़ता है।
डबल जियोपर्डी का खतरा
कोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह के नियम से आरोपी पर एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमा चल सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 20(2) और सीआरपीसी की धारा 300 के खिलाफ है।
संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
बेंच ने कहा कि कोई भी प्रक्रिया जो मूल कानून यानी सीआरपीसी में नहीं है, वह राज्य के नियमों के जरिए लागू नहीं की जा सकती। ऐसा करना आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
राज्य का नियम केंद्र के कानून के खिलाफ
कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकार का यह नियम केंद्र के कानून सीआरपीसी से टकराता है, इसलिए इसे हटाना जरूरी है। कोर्ट ने दोहराया कि राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार है, लेकिन वह केंद्र के कानून की सीमाओं में रहकर ही नियम बना सकती है।
फैसले का असर
इस फैसले के बाद अब कर्नाटक में कोई भी निजी शिकायत सीधे सेशंस कोर्ट में दाखिल नहीं की जा सकेगी। सभी ऐसे मामले पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट में ही जाएंगे। कोर्ट ने यह नियम तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया है।

