MP HC: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोपाल रियासत के पूर्व नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की निजी संपत्तियों को लेकर चल रहे लंबे विवाद में ट्रायल कोर्ट के 14 फरवरी 2000 के फैसले को रद्द कर दिया है।
एक साल के भीतर मामला निपटारा के दिए आदेश
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जिस फैसले के आधार पर यह निर्णय दिया था, उसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मामला दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को भेज दिया है और निर्देश दिया है कि 1999 से लंबित इस मामले का निपटारा एक साल के भीतर किया जाए।
नवाब की संपत्ति के बंटवारे, कब्जे और हिसाब-किताब से जुड़ा मामला
मामला नवाब की संपत्ति के बंटवारे, कब्जे और हिसाब-किताब से जुड़ा है। यह मुकदमे सबसे पहले 1971 में दायर किए गए थे, जिन्हें 1999 में फिर से नंबर दिया गया। ट्रायल कोर्ट ने नवाब की बेटी साजिदा सुल्तान के वारिसों को संपत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी माना था। इनमें अभिनेता सैफ अली खान, सोहा अली खान, सबा सुल्तान और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर शामिल हैं।
ये हैं दोनों पक्षों के पक्षकार
मुकदमा करने वालों में नवाब के बड़े भाई के बेटे की पत्नी सुरैया राशिद (अब दिवंगत), उनकी बेटियां महबानो (दिवंगत) और नीलोफर, बेटे नादिर और यावर (दोनों दिवंगत) के कानूनी प्रतिनिधि शामिल हैं। दूसरे अपीलकर्ता में नवाब की बेटी कमर ताज राबिया सुल्तान भी शामिल हैं। इन सभी ने नवाब की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग की थी।
सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं मुकदमे
ट्रायल कोर्ट ने माना था कि मुकदमे योग्य हैं और सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, लेकिन उसने यह भी कहा था कि नवाब की निजी संपत्ति मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के तहत नहीं बंटी जा सकती। इसके विपरीत अपीलकर्ताओं का तर्क था कि नवाब की संपत्ति उनकी व्यक्तिगत संपत्ति थी और उनकी मृत्यु के बाद यह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सभी वारिसों में बंटनी चाहिए थी।
संपत्ति का बंटवारा व्यक्तिगत कानून के अनुसार होगा
सरकार की ओर से 1962 में जारी एक पत्र में कहा गया था कि नवाब की संपत्ति उनकी बेटी साजिदा सुल्तान की मानी जाएगी। अपीलकर्ताओं ने इस आदेश को अवैध बताया और कहा कि साजिदा सुल्तान अकेली वारिस नहीं हो सकतीं। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में 1997 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर भरोसा किया था, जो रामपुर के नवाब की संपत्ति से जुड़ा था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि यह फैसला 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलट दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि संपत्ति का बंटवारा व्यक्तिगत कानून के अनुसार होगा।
यदि जरूरत हो तो ट्रायल कोर्ट सभी पक्षों को नए सिरे से सबूत पेश की दे अनुमति
हाईकोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल कोर्ट ने एक ऐसे फैसले पर भरोसा किया जो अब मान्य नहीं है, तो मामला दोबारा सुनवाई के लिए भेजा जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जरूरत हो तो ट्रायल कोर्ट सभी पक्षों को नए सिरे से सबूत पेश करने की अनुमति दे सकता है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि चूंकि यह मामला 1999 से लंबित है, इसलिए ट्रायल कोर्ट को इसे एक साल के भीतर निपटाने की कोशिश करनी चाहिए।
यह है केस के विभिन्न बिंदु
- मामला नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की निजी संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा है।
- ट्रायल कोर्ट ने 2000 में अपीलकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी थी।
- हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जिस फैसले पर भरोसा किया, वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलटा जा चुका है।
- हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर मामला दोबारा सुनवाई के लिए भेजा।
- कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि एक साल के भीतर मामले का निपटारा करे।
- संपत्ति के दावेदारों में सैफ अली खान, सोहा अली खान, शर्मिला टैगोर और अन्य रिश्तेदार शामिल हैं।
- अपीलकर्ताओं का तर्क है कि संपत्ति मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सभी वारिसों में बंटनी चाहिए।
- सरकार ने 1962 में साजिदा सुल्तान को संपत्ति की मालिक माना था, जिसे अपीलकर्ताओं ने चुनौती दी।

