Reservation Case: सुप्रीम कोर्ट ने उन स्वैच्छिक एजेंसियों, संगठनों और स्वायत्त निकायों में आरक्षण लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है, जिन्हें केंद्र सरकार से अनुदान मिलता है।
पीठ की सुनवाई के दौरान निर्देश
न्यायमूर्ति सूर्या कांत, उज्जल भुइयां और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सरकार को एक व्यापक प्रतिनिधित्व (comprehensive representation) दे सकते हैं। हमें इस पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि संबंधित अधिकारी सरकार की नीति के अनुसार इस प्रतिनिधित्व पर विचार करेंगे।
यह थी याचिका
याचिका का उद्देश्य था कि सरकार से अनुदान पाने वाली संस्थाओं, स्वायत्त निकायों और संगठनों में सेवाओं में आरक्षण लागू किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 30 सितंबर और 7 अक्टूबर 1974 को ही केंद्र सरकार ने ऐसे संगठनों में आरक्षण लागू करने के लिए कार्यपालिका निर्देश (executive instructions) जारी किए थे। बाद में, मंत्रालयों और विभागों को यह निर्देश दिया गया कि अनुदान पाने की शर्तों में आरक्षण नीति का पालन अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। इसके बावजूद, यह प्रावधान जमीनी स्तर पर लागू नहीं हुआ।
पीठ की टिप्पणियां
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी कि बीते 50 वर्षों से ये निर्देश सिर्फ औपचारिकता के तौर पर जारी किए जा रहे हैं, जिनका पालन नहीं हो रहा। इस पर न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि 2024 में नए निर्देश जारी किए गए। “2024 में जो जारी हुआ, वह तो पिछले सभी निर्देशों का संकलन (compendium) मात्र था।
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को सीधे कोर्ट आने से पहले यह कदम उठाना चाहिए था: किसी 1-2 संस्थाओं का उदाहरण लेकर सरकार को ठोस जानकारी देनी चाहिए थी।यह दिखाना चाहिए था कि उन संस्थाओं ने अनुदान तो लिया, लेकिन आरक्षण नीति लागू नहीं की। फिर सरकार से अनुरोध करना चाहिए था कि जब तक आरक्षण लागू न हो, तब तक अनुदान रोक दिया जाए। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ताओं ने बिना उचित समय दिए यह याचिका दाखिल कर दी। पहले उन्हें ठोस जानकारी के साथ व्यापक प्रतिनिधित्व करना चाहिए था।”
RTI जानकारी पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरटीआई के माध्यम से मांगी गई जानकारी अस्पष्ट (vague) थी। “उन्होंने किसी विशेष संस्था का उल्लेख करने के बजाय सीधे आरक्षण की मांग कर दी।”
‘आरक्षण नीति सरकार का विशेषाधिकार है’
अंत में कोर्ट ने दोहराया कि आरक्षण नीति का विषय (policy matter) है। “किसी संस्था में आरक्षण लागू करना या न करना, यह पूरी तरह नीति-निर्माताओं (policymakers) का अधिकार है। इस पर न्यायालय की राय देना उचित नहीं होगा।”

