Right to Health:दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) का सीधा उल्लंघन है।
आम आदमी के लिए क्या है सबक?
यदि कोई सरकारी अस्पताल बिना ठोस कारण के इलाज से मना करता है, तो यह कानूनी अपराध है। ऐसी स्थिति में मरीज प्राइवेट इलाज का बिल सरकार से क्लेम कर सकता है। स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) अब सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक कानूनी सुरक्षा कवच है। हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को आदेश दिया है कि वह एक नाबालिग छात्र के इलाज का खर्च (Reimbursement) वापस करे।
क्या था मामला? (The Incident)
- हादसा: एक नाबालिग छात्र स्कूल में खेलते समय गिर गया, जिससे उसके बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया।
- अस्पताल 1 (डॉ. हेडगेवार आरोग्य संस्थान): यहाँ ले जाने पर पता चला कि ‘बेसिक मेडिकल सप्लाई’ ही उपलब्ध नहीं है।
- अस्पताल 2 (चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय): यहाँ डॉक्टर उपलब्ध न होने के कारण इलाज से मना कर दिया गया।
- मजबूरी: अंत में परिवार को बच्चे को प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा, जहाँ करीब 14,000 रुपये खर्च हुए।
कोर्ट का कड़ा रुख और फैसला
- जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव ने इस मामले पर सुनवाई करते कई निर्देश दिए।
- सरकार की जिम्मेदारी: समय पर इलाज मुहैया कराना राज्य की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसे संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर टाला नहीं जा सकता।
- भुगतान का आदेश: कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 12,000 रुपये की राशि 2 महीने के भीतर चुकाने का निर्देश दिया।
- मुआवजे की छूट: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह आजादी भी दी कि वह अलग से ‘सिविल सूट’ फाइल कर हर्जाने (Compensation) की मांग कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला
दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र किया। उस फैसले में कहा गया था कि “जीवन की रक्षा करना सरकार का सर्वोच्च कर्तव्य है। किसी भी सरकारी अस्पताल द्वारा आपातकालीन चिकित्सा सहायता (Emergency Medical Aid) देने में विफलता व्यक्ति के जीवन के अधिकार का हनन है।

