Right to travel: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि यात्रा करने का अधिकार संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है।
76 वर्षीय शरद खातू के मामले में की सुनवाई
न्यायमूर्ति एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी 76 वर्षीय शरद खातू के मामले में की, जिनका पासपोर्ट नवीनीकरण/पुनः जारी करने का आवेदन पुलिस पोर्टल पर दर्ज एक गलत प्रविष्टि के आधार पर पासपोर्ट प्राधिकरण ने अस्वीकार कर दिया था। उस प्रविष्टि में दर्शाया गया था कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है। कोर्ट ने कहा, यात्रा करने के अधिकार को निष्फल करने के लिए अनावश्यक नौकरशाही अवरोध (bureaucratic impediments) नहीं डाले जाने चाहिए। जब पुलिस ने उच्च न्यायालय को बताया कि वास्तव में खातू के खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है, तब अदालत ने 14 अक्टूबर को पारित आदेश में उन्हें नया आवेदन देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पासपोर्ट प्राधिकरण खातू के आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय ले, क्योंकि वे दुबई जाकर अपने बेटे और पोते-पोतियों से मिलना चाहते हैं।
विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार
पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। “इस बहुमूल्य अधिकार को विफल करने के लिए अनावश्यक नौकरशाही बाधाएं नहीं डाली जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस पोर्टल पर गलत प्रविष्टि के कारण खातू को कीमती समय गंवाना पड़ा। पुलिस ने अब यह पुष्टि की है कि उनके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है। अतः हम पुलिस अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि गलत प्रविष्टि को तुरंत हटाया जाए और याचिकाकर्ता को आगे कोई कठिनाई न हो।
यह है पूरा केस
खातू की याचिका के अनुसार, उनका पासपोर्ट अक्टूबर 2022 में समाप्त हो गया था। उन्होंने नवीनीकरण के लिए आवेदन किया, लेकिन पासपोर्ट प्राधिकरण ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि 1990 का एक आपराधिक मामला लंबित है। जब उन्होंने पुलिस थाने और संबंधित अदालत से जानकारी ली, तो पाया कि कोई मामला लंबित नहीं है। इसके बावजूद पासपोर्ट कार्यालय ने उनका आवेदन बंद कर दिया, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

