RTI vs Privacy: राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार के उस निर्णय को सही ठहराया है, जिसमें एक महिला को उसके पति की सैलरी स्लिप (Pay Slips) और वेतन का विवरण देने से इनकार कर दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि बिना किसी ‘ठोस जनहित’ (Public Interest) के ऐसी निजी जानकारी साझा नहीं की जा सकती। आमतौर पर वैवाहिक विवादों (जैसे मेंटेनेंस केस) में, अगर अदालत को लगता है कि गुजारा भत्ता तय करने के लिए सैलरी जानना जरूरी है, तो कोर्ट के आदेश पर यह जानकारी दी जा सकती है। लेकिन RTI के जरिए इसे ‘अधिकार’ के रूप में मांगना अब मुश्किल होगा।
पूरा मामला क्या था? (Background)
- याचिका: एक महिला ने सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट के तहत अपने पति के वेतन का विवरण मांगा था। उसका पति भीलवाड़ा में पुलिस विभाग में कार्यरत था।
- इनकार: सक्षम अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से मना कर दिया कि यह “व्यक्तिगत जानकारी” (Personal Information) है और किसी तीसरे पक्ष (Third Party) से संबंधित है।
- अपील: जब राज्य सूचना आयोग ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, तो पत्नी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट का फैसला और कानूनी तर्क
- जस्टिस कुलदीप माथुर की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए कई निर्देश दिए।
- सार्वजनिक हित का अभाव: कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी के खुलासे का किसी सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से कोई लेना-देना नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट का हवाला: हाई कोर्ट ने ‘गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त (2013)’ के ऐतिहासिक फैसले पर भरोसा किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी कर्मचारी का प्रदर्शन या उसकी सैलरी का विवरण मुख्य रूप से ‘कर्मचारी और नियोक्ता’ (Employer and Employee) के बीच का मामला है। यह जानकारी “निजी जानकारी” (Personal Information) के दायरे में आती है।
RTI एक्ट के तहत छूट (Exemptions)
RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत ऐसी व्यक्तिगत जानकारी देने से छूट मिली हुई है, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि से संबंध न हो या जिससे किसी व्यक्ति की निजता (Privacy) का अनावश्यक हनन होता हो।

