SC on Patriarchy: सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर एक बेहद गंभीर और विचलित करने वाली टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने 2012 में अपनी पत्नी को जलाकर मारने वाले एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए यह कड़वी सच्चाई पेश की। अदालत ने कहा कि पत्नी को जलाना या घरेलू शोषण जैसी घटनाएं केवल ‘छिटपुट हादसे’ (Aberrations) नहीं हैं, बल्कि यह एक “बीमारी से ग्रस्त सामाजिक व्यवस्था” (Disease-afflicted social order) का संकेत हैं।
प्रगति बनाम पितृसत्ता: एक विरोधाभास (The Paradox)
- कोर्ट ने देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के बीच एक गहरा विरोधाभास नोट किया।
- तरक्की: भारत ने आर्थिक विकास, बढ़ती साक्षरता और शिक्षा व कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी देखी है।
- कड़वा सच: इसके बावजूद, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में ‘पितृसत्ता’ (Patriarchy) आज भी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। घर के भीतर फैसले लेने का अधिकार आज भी पुरुषों के पास है और महिलाओं की स्वायत्तता शर्तों पर टिकी है।
- दोहरा बोझ: कोर्ट ने कहा कि अगर महिला कमाती भी है, तो भी समाज उम्मीद करता है कि वह काम पर जाने से पहले घर के सारे काम निपटाए और लौटने के बाद खाना बनाने जैसे कामों में जुट जाए।
डराने वाले आंकड़े (The Sobering Picture)
- सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद जमीनी हकीकत को ‘गंभीर’ बताया।
- NCRB डेटा: 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए।
- दहेज हत्याएं: दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण देश में आज भी हर साल 6,000 से ज्यादा महिलाओं की जान जा रही है।
- सरकारी योजनाएं: ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘उज्ज्वला योजना’ और ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ जैसी योजनाएं जीवन स्तर सुधार सकती हैं, लेकिन वे विवाह और परिवार के भीतर महिलाओं की भूमिका के बारे में सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच को नहीं बदल पा रही हैं।
‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (Dying Declaration) की अहमियत
- इस मामले में आरोपी ने अपनी सजा को चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने मृतक पत्नी के ‘मरणासन्न कथन’ (Dying Declaration) पर भरोसा जताया।
- सत्य की शक्ति: कोर्ट ने दार्शनिक अंदाज में कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने ‘ईश्वर’ (Maker) से मिलने वाला होता है और मौत सामने खड़ी होती है, तो झूठ बोलने के सारे कारण अर्थहीन हो जाते हैं।
- कानूनी स्थिति: यदि मरणासन्न कथन सुसंगत, विश्वसनीय और बिना किसी के सिखाए-पढ़ाए दिया गया है, तो इसके आधार पर सजा सुनाई जा सकती है।
कोर्ट का सवाल: “हम भारत के लोग…”
जस्टिस करोल ने एक आत्ममंथन करने वाला सवाल पूछा, “दशकों पुराने कानूनों, सुधारों और कार्यस्थल से लेकर सेना तक में समानता मिलने के बाद भी, महिलाओं के शरीर, पसंद और जीवन पर नियंत्रण की मानसिकता समाज में इतनी गहरी क्यों है? शायद, इसका उत्तर केवल ‘हम, भारत के लोग’ के पास है।”
निष्कर्ष: सामाजिक सर्जरी की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून और आर्थिक सशक्तिकरण केवल बाहरी कवच हैं। असली बदलाव तब आएगा जब समाज की उस ‘बीमारी’ का इलाज होगा जो महिला को पुरुष के अधीन या उसकी संपत्ति मानती है।

