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School Punishment Row: एक शिक्षक ने छात्रों को दो घंटे तक धूप में खड़ा रखा…यह दी हाईकोर्ट ने चेतावनी

School Punishment Row:कर्नाटक हाई कोर्ट ने बेंगलुरु के एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षकों के खिलाफ चल रही जांच पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की सिंगल-जज बेंच ने स्कूल के प्रिंसिपल, प्रशासनिक डीन और दो शिक्षकों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। इन सभी के खिलाफ पुलिस ने ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ (JJ Act) के तहत मामला दर्ज किया था। इन पर आरोप था कि इन्होंने देर से आने वाले छात्रों को लगभग दो घंटे तक कड़ी धूप में खड़ा रखा था।

कोर्ट की मौखिक चेतावनी: “दोबारा शिकायत आई तो रोक हटा दूंगा”

  • हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए याचिकाकर्ताओं को स्पष्ट शब्दों में आगाह किया।
  • सख्त हिदायत: “इसे दोबारा न दोहराएं। यदि किसी अन्य छात्र की ओर से ऐसी ही शिकायत आई, तो मैं जांच पर लगी रोक तुरंत हटा दूंगा।”
  • अगली सुनवाई तक रोक: कोर्ट ने अगली सुनवाई तक पुलिस जांच की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

मामला क्या था? (The Allegations)

  • घटना: 13 मार्च को कुछ छात्र स्कूल देरी से पहुंचे थे। आरोप है कि उन्हें दंड के रूप में 2 घंटे तक तेज धूप में खड़ा रखा गया।
  • FIR: सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने के बाद, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) की शिकायत पर पुलिस ने धारा 75 (बच्चे के प्रति क्रूरता के लिए सजा) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत केस दर्ज किया था।

स्कूल और शिक्षकों का बचाव (The Defense)

  • शिक्षकों के वकील अर्नव बागलवाड़ी ने कोर्ट में तर्क दिया।
  • वीडियो की सच्चाई: वकील ने दावा किया कि शिकायत केवल एक वायरल वीडियो के आधार पर दर्ज की गई है, जिसमें तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है।
  • स्कूल का पक्ष: दलील दी गई कि छात्र देर से आए थे, इसलिए उन्हें असेंबली के दौरान एक अलग कतार में खड़ा किया गया था। असेंबली के बाद उन्हें केवल अपने माता-पिता को फोन करने के लिए कहा गया था।
  • अभिभावकों का हंगामा: याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि जब माता-पिता स्कूल आए, तो उन्होंने प्रिंसिपल के ऑफिस में हंगामा (Ruckus) किया।

कानूनी आधार (Juvenile Justice Act)

याचिकाकर्ताओं ने FIR को रद्द (Quash) करने की मांग की है। उनका तर्क है कि छात्रों को कतार में खड़ा करना किसी भी तरह से ‘क्रूरता’ या अपराध की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट अब इस मामले की गहराई से जांच करेगा कि क्या यह केवल अनुशासन का हिस्सा था या वास्तव में बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन।

निष्कर्ष: अनुशासन और अधिकार के बीच की रेखा

यह मामला स्कूलों में दिए जाने वाले दंड की सीमाओं पर बहस छेड़ता है। हाई कोर्ट ने फिलहाल शिक्षकों को राहत दी है, लेकिन यह साफ कर दिया है कि छात्रों के साथ किसी भी तरह का अमानवीय व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

SourceNini
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