Sets aside single judge orders: राजस्थान हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने सिंगल जज द्वारा पारित दो आदेशों को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा, सिंगल जज ने एक सामान्य सिविल मामले में PIL (जनहित याचिका) जैसी शक्तियों का इस्तेमाल किया, जो उनके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर था।
मामला क्या था?
- यह विवाद दो सरकारी कर्मचारियों (एक वरिष्ठ डॉक्टर और एक दृष्टिबाधित कर्मचारी) की याचिकाओं से शुरू हुआ था।
- मूल मुद्दा: दोनों कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी अपने सरकारी आवास में रहना चाहते थे और उन्होंने बेदखली नोटिस को चुनौती दी थी।
- मोड़: सुनवाई के दौरान दोनों ने मकान खाली कर दिए, जिससे मूल विवाद (Lis) खत्म हो गया।
विवाद कहां बढ़ा?
- विवाद तब शुरू हुआ जब सिंगल जज ने मामला खत्म करने के बजाय इसे एक “जांच” का रूप दे दिया।
- सर्वे का आदेश: जज ने सरकार से रिपोर्ट मांगी कि कितने रिटायर कर्मचारी अब भी अवैध रूप से सरकारी मकानों में रह रहे हैं।
- कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति: रिपोर्ट न मिलने पर जज ने संपत्तियों के निरीक्षण के लिए एक कोर्ट कमिश्नर नियुक्त कर दिया।
- अभद्र व्यवहार का आरोप: निरीक्षण के दौरान उपेंद्र सिंह नामक व्यक्ति पर आरोप लगा कि उन्होंने फोन पर कोर्ट कमिश्नर और अधिकारियों को “हरामजादे” जैसे अपशब्द कहे और कहा कि वह “अदालत के ऐसे आदेश जेब में रखते हैं।”
सिंगल जज की सख्त कार्रवाई
इस अपमान से नाराज होकर सिंगल जज ने संबंधित SHO को कोर्ट में तलब किया। आरोपी उपेंद्र सिंह के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए। पुलिस को FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
डिवीजन बेंच का फैसला (23 फरवरी, 2026)
जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की बेंच ने उपेंद्र सिंह की अपील पर सुनवाई करते हुए सिंगल जज के आदेशों को रद्द कर दिया।
यह रही कोर्ट की मुख्य दलीलें
- अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: बेंच ने कहा, “विद्वान सिंगल जज ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। मामले को ऐसे चलाया गया जैसे कि यह कोई PIL हो, और याचिका में मांगी गई राहत से कहीं आगे जाकर निर्देश जारी किए गए।”
- सीमाएं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल विवाद (सरकारी आवास खाली करना) खत्म हो चुका था, तो जज को आपराधिक शिकायतों या सार्वजनिक हित के मुद्दों में नहीं पड़ना चाहिए था।
- प्रक्रियात्मक त्रुटि: एक सामान्य ‘रिट याचिका’ को जनहित याचिका या ‘क्रिमिनल केस’ की तरह ट्रीट नहीं किया जा सकता।

