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Sexual relations: लड़की की दोस्ती का मतलब यौन संबंधों का लाइसेंस नहीं…चाहे वेलेंटाइन डे ही क्यों न हो

Sexual relations: दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस कठपालिया ने कड़े शब्दों में कहा कि किसी लड़की की मित्रता या वेलेंटाइन डे जैसा विशेष दिन किसी भी पुरुष को उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार नहीं देता। जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने एक 17 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म के आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। आरोपी पर आरोप है कि उसने किशोरी की मांग में जबरन सिंदूर भरा और फिर उसके साथ अनाचार किया।

अदालत की मुख्य और तीखी टिप्पणियां

  • दोस्ती बनाम सहमति: महज इसलिए कि एक लड़की किसी लड़के के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखती है और वह दिन वेलेंटाइन डे है, यह लड़के को उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाने का लाइसेंस नहीं देता।
  • सिंदूर भरना: “बिना सहमति के किसी लड़की की मांग में सिंदूर भरना भी किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता, भले ही यह कानून में परिभाषित कोई विशिष्ट अपराध न हो।”
  • पीड़िता का पक्ष: कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता ने FIR से लेकर ट्रायल तक अपने बयानों में अटूट निरंतरता दिखाई है और वह खुद जमानत का विरोध करने के लिए अदालत में मौजूद थी।

मामले की पृष्ठभूमि: क्या है पूरा विवाद?

  • संपर्क: पीड़िता और आरोपी पिछले एक साल से फोन के जरिए एक-दूसरे को जानते थे।
  • घटना: वर्ष 2025 में वेलेंटाइन डे के दिन आरोपी ने लड़की को अपने घर बुलाया। आरोप है कि वहां उसने जबरन उसकी मांग भरी और बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाए।
  • कानूनी कार्रवाई: आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

आरोपी की दलील और पुलिस का विरोध

  • आरोपी का पक्ष: याचिकाकर्ता ने दावा किया कि घटना वाला दिन “विशेष” (वेलेंटाइन डे) था और पीड़िता की उम्र 18 साल थी। उसने तर्क दिया कि सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था।
  • पुलिस का पक्ष: दिल्ली पुलिस ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता नाबालिग थी और घटना पूरी तरह से जबरदस्ती की गई थी।

निष्कर्ष: न्याय सर्वोपरि

अदालत ने आरोपी के ‘सहमति’ वाले दावों को खारिज कर दिया और पीड़िता की गवाही पर भरोसा जताते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। यह फैसला समाज में इस धारणा को तोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है कि किसी विशेष दिन या मित्रता को ‘मौन सहमति’ माना जा सकता है।

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