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Student suicides: छात्र आत्महत्याएं सिस्टम की नाकामी का संकेत…सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी

Student suicides: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देश में छात्रों की आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं और यह एक बड़ी सिस्टम फेलियर यानी व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है।

देशभर के लिए 15 अहम गाइडलाइंस जारी की

कोर्ट ने कहा कि यह समस्या इतनी गंभीर है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस मुद्दे पर देशभर के लिए 15 अहम गाइडलाइंस जारी की हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2022 की रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया’ बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में देश में कुल 1,70,924 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए, जिनमें से 7.6% यानी करीब 13,044 मामले छात्रों के थे। इनमें से 2,248 आत्महत्याएं परीक्षा में फेल होने के कारण हुईं।

पिछले दो दशकों में छात्र आत्महत्याएं बढ़ीं

कोर्ट ने कहा कि पिछले दो दशकों में छात्र आत्महत्याओं की संख्या 2001 में 5,425 से बढ़कर 2022 में 13,044 हो गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं, पढ़ाई का दबाव, सामाजिक कलंक और संस्थागत असंवेदनशीलता जैसे कारणों से छात्र आत्महत्या कर रहे हैं।

मानसिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार से जोड़ा

कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा है। खासकर कोटा, जयपुर, सीकर, विशाखापत्तनम, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में जहां बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं, वहां तत्काल अंतरिम उपाय जरूरी हैं। कोर्ट ने कहा कि सभी शिक्षण संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों और काउंसलर का अनुपात संतुलित हो। परीक्षा के समय और अकादमिक बदलाव के दौरान छात्रों को लगातार, अनौपचारिक और गोपनीय सहयोग देने के लिए डेडिकेटेड मेंटर्स या काउंसलर नियुक्त किए जाएं।

महत्वपूर्ण गाइडलाइंस इस प्रकार हैं

  1. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, नजदीकी अस्पतालों और आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन के लिए लिखित प्रोटोकॉल हर संस्थान में अनिवार्य होंगे।
  2. टेली-मानस सहित सभी आत्महत्या हेल्पलाइन नंबर हॉस्टल, क्लासरूम, कॉमन एरिया और वेबसाइट पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में प्रदर्शित किए जाएं।
  3. सभी टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ को साल में कम से कम दो बार सर्टिफाइड मानसिक स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स से ट्रेनिंग दी जाए।
  4. अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, LGBTQ+, दिव्यांग, अनाथ, ट्रॉमा झेल चुके या आत्महत्या का प्रयास कर चुके छात्रों के साथ संवेदनशील और भेदभाव रहित व्यवहार सुनिश्चित किया जाए।
  5. यौन उत्पीड़न, रैगिंग जैसी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई के लिए हर संस्थान में एक आंतरिक समिति या अधिकृत अधिकारी नियुक्त हो।
  6. माता-पिता और अभिभावकों के लिए नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
  7. छात्र ओरिएंटेशन और को-करिकुलर एक्टिविटीज में मानसिक स्वास्थ्य, इमोशनल रेगुलेशन और लाइफ स्किल्स को शामिल किया जाए।
  8. हर संस्थान सालाना रिपोर्ट तैयार करे जिसमें वेलनेस इंटरवेंशन, रेफरल, ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों का विवरण हो।
  9. परीक्षा पैटर्न की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम हो और वे केवल रैंक या स्कोर से अपनी पहचान न जोड़ें।
  10. सभी कोचिंग और ट्रेनिंग संस्थानों में रेगुलर करियर काउंसलिंग की सुविधा छात्रों और उनके अभिभावकों को दी जाए।
  11. हॉस्टल संचालक, वार्डन और केयरटेकर यह सुनिश्चित करें कि परिसर में कोई उत्पीड़न, नशा या बुलिंग न हो।

केंद्र सरकार को 90 दिन में रिपोर्ट देनी होगी

कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह 90 दिन के भीतर एक एफिडेविट दाखिल करे, जिसमें बताए कि इन गाइडलाइंस का पालन कैसे किया जा रहा है। साथ ही, छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर बनी नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट और सिफारिशें कब तक पूरी होंगी, इसका टाइमलाइन भी बताएं।

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